देश में किसी के साथ अगर सबसे घटिया मज़ाक होता है तो वह किसानों के साथ होता है। खेती-किसानी की समस्या को हल करने के सवाल पर हर सरकार खुलेआम झूठ बोलते आई है। मौजूदा भाजपा सरकार उसी का एक एक्सटेंशन थी। हर रैली और जनसभा में प्रधानमंत्री से लेकर हर छुटभैया नेता किसानों का नाम लेना नहीं भूलता है, लेकिन किसान और किसानी है कि जस का तस। कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के समय में स्वामीनाथन आयोग बनाई गई। इसके बाद आयोग की सिफ़ारिशें धूल फांकती रही। चुनावी रैलियां किसानों के नाम पर गरमाती रही। मोदी जी आए तो वही मंत्र जपते हुए आगे बढ़े, हुआ कुछ नहीं। पिछले 2 सालों में सिर्फ़ दिल्ली में कई बार देश भर के किसान इकट्ठा हुए। किसानों की मांगें बहुत बुनियादी रही- फसलों का सही दाम (एमएसपी), कर्ज़माफ़ी। इस बीच किसान आत्महत्या करते रहे, मध्यप्रदेश में किसानों की गोली मारकर हत्या हुई, आंदोलन चलता रहा, महाराष्ट्र के किसान मंडी में 50 पैसे प्रति किलो प्याज बेचते रहे और इधर लोक कल्याण मार्ग में बैठा एक ' फ़कीर' आमदनी दुगुनी करने का सपना दिखाता रहा। अब उस सपने को चुनावी घोषणा पत्र (मेनिफ़ेस्टो...