तीन महीने पहले जब शनि सिंगनापुर मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर विवाद छिड़ा था तो लगा कि हम अब भी कितने पीछे हैं। हमारी सोच कितनी पीछे ही नहीं, बहुत ओछी भी है। यह हमारे देश का दुर्भाग्य ही है कि हमारी माँ, बहने और बेटियाँ मंदिरों और मस्जिदों में जाने के लिए भी संघर्ष कर रही है। असल जिंदगी में तो वे जंग लड़ती ही रही हैं। अधिकार के साथ- साथ उनकी आस्था और भक्ति की भावनाओं को भी आहत पहुँच रही है। क्या बिना संघर्ष और हंगामे के महिलाएँ जी नहीं सकती? क्या बिना सड़क पर उतरे वे मंदिरों और मस्जिदों में प्रवेश नहीं कर सकती? क्या बिना दहेज के लड़कियाँ ब्याही नहीं जा सकती? क्या बिना माँग के हम उनका हक और आरक्षण नहीं दे सकते? क्या इसके लिए भी संसद में बिल पेश करने की जरूरत होनी चाहिए? यह सब हमारे सामाजिक सोच की एक गंदी उपज है। कोई शास्त्र या वेद तो नहीं कहता है कि पुरुष अपने अनुसार महिलाओं को चलाए या फिर उसके आस्था और भक्ति पर ही रोक लगा दे। जनवरी 2016 में तृप्ति देसाई ने मंदिरों में लैंगिक भेदभाव को लेकर जब राष्ट्रीय बहस छेड़ा, तो ज्ञात हुआ कि देश के बड़े- बड़े मंदिर और मस्जिद जो कि विश्व प्...