Skip to main content

Posts

Showing posts from 2017

नास्तिकता पार्ट-2

आप/तुम क्या हैं/हो? बस इतना ही समझ लीजिए कि आप कुछ भी नहीं हैं। जब आपके जीवन जीने के अधिकतर सोच दूसरों के दिए हुए हों, तो आपकी अपनी व्यक्तित्व ही डुप्लीकेट है। आप अपने परिवार, समाज के द्वारा फ़ैलाए गए चादर में ढके हुए एक व्यक्ति हैं और आप कहते हैं कि आप 'आप' हैं। जब तक आप उस चादर को हटाकर ख़ुद से साक्षात्कार नहीं करते, मैं नहीं समझूंगा कि ये आप हैं। आप अपनी विशिष्टता दूसरों को ख़ुश या दुखी करने में दिखाते हैं, न कि तार्किक होने में। आपको बताया गया है कि एक भगवान है, आपने मान लिया। बताया गया कि चार हैं, आपने वो भी मान लिया। आप कभी भी अपने हिंदू, मुस्लिम, जाति विशेष होने पर परिवार या समाज पर सवाल नहीं उठाते। उस पर बिना प्रश्न चिह्न खड़े किए उसको पोषते हैं। जो इन चीज़ों को ग़लत भी समझते हैं (या नहीं मानते), इसके बावजूद मुर्दाशांति से भर कर पूरा जीवन जी लेते हैं। क्योंकि उन्हें इतने बड़े सामाजिक व्यवस्था के ख़िलाफ़ जाने में घबराहट होती है। वे अपना खाल नहीं उतारना चाहते हैं। मैं तुम्हारे धार्मिक भावनाओं पर ठेस पहुंचाने आया हूँ, क्योंकि जब तक ठेस नहीं पहुंचेगा कुछ नया नहीं होगा। मैं ...

नास्तिकता ही भविष्य

पिछले कई दशकों से भारत में धर्म और धार्मिक पाखंड के ख़िलाफ़ जागरूकता बड़े स्तर पर नहीं चलाई गई है या इसके ख़िलाफ़ लड़ाई नहीं लड़ी गई है। कम से कम आज़ादी के बाद तो बिल्कुल भी नहीं। कई छोटे- छोटे प्रयास हुए, लेकिन वे कारगर साबित नहीं हुए। तो ऐसे वक़्त में जब धार्मिक राजनीति देश के ऊपर सर से बह रही है, ज़रूरत है कि हम नास्तिकता के प्रचार- प्रसार को बढ़ावा दें और तर्कपूर्ण तरीके से लोगों के अंदर वैज्ञानिक सोच को विकसित कर पाएं। क्योंकि नास्तिकता ही समाज और मानव के संपूर्ण विकास में अंततः सहायक साबित होगा। पूरी दुनिया में क़रीब 80- 85 करोड़ लोग नास्तिक हैं, जिनमें ज़्यादातर एशिया के बाहर के देश हैं। यूरोप के सबसे विकसित देशों में 80 प्रतिशत तक नास्तिक लोग रहते हैं। वहां धार्मिक प्रभाव मानवीय विकास में गतिरोध नहीं बनते हैं। जबकि भारत की आबादी का बहुत कम या न के बराबर नास्तिकता को मानता है(0.50% के आसपास)। हमारी सामाजिक संरचना को ही इस तरीके गढ़ दिया गया है कि हम उसे तोड़ नहीं पाते। अंबेडकर और भगत सिंह को पढ़ तो लेते हैं, लेकिन वे क्या बताना चाहे, उसे जीवन में उतारने को तैयार नहीं हैं। मानसिक ग़ुलामी स...

सावित्रीबाई फुले: देश की पहली महिला शिक्षिका या समाज की महानायिका?

ज़रा सोचिए, आज 21वीं सदी में समान शिक्षा देने में हमारा समाज जब असमंजस में जी रहा है, तो लगभग 200 साल पहले की हालत क्या होगी। शीर्षक में सावित्रीबाई फुले को देश की पहली महिला शिक्षिका या समाज की महानायिका होने पर प्रश्न चिह्न इसलिए, क्योंकि आज तक समाज के कुछ ठेकेदारों ने उस नाम को आम जनों के बीच प्रसिद्ध नहीं होने दिया। आप आज के सियासत का प्लैटफार्म माने जाने वाले ट्विटर के ट्रेंड को भी देखिए, तो शिक्षक दिवस डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन तक सिमटती नज़र आती है। शिक्षक दिवस को हम भले राधाकृष्णन के जन्मदिन के रूप में मना कर इसके दायरे को सीमित कर लें, लेकिन इतिहास में शिक्षकों और समाज उत्थान के संबंधों को विस्तार से देखना ज़रूरी है। वैसे तो इतिहास ने सावित्रीबाई को बहुत कम जगह दी है, लेकिन बहुजन के लिए वो एक महानायिका हैं। आख़िर शिक्षक दिवस के दिन सावित्रीबाई फुले को हम क्यों याद कर रहे हैं, उनका इतिहास हमारे आधुनिक समाज को जानना क्यों ज़रूरी है, इसके लिए 19वीं सदी की इस क्रांतिकारी महिला के बारे कुछ  ख़ास बातें  जाननी ज़रूरी है... 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा ज़िले के नायगांव...

ये आकाशवाणी है...

इस आवाज़ के साथ शायद आपकी भी ज़िन्दगी का कुछ हिस्सा गुजरा हो। घर में कल पुराने दोस्त से मुलाक़ात हुई, तो सबसे पहले यही याद आया। काफ़ी समय तक इसने मेरा साथ दिया था। दादाजी(बाबा) होते तो इसका पूरा इतिहास अच्छे से बता देते। अनुमान लगा रहा हूँ कि ये 30 साल से भी ज़्यादा पुराना है। क्योंकि मैं बचपन से इसके साथ हूँ। दादी बता रही है कि बाबा ने उस समय इसे 600 रूपए में ख़रीदा था। इससे ज़्यादा उनको भी कुछ याद नहीं है। अब तो ये ख़राब हो चुका है, बच्चों ने इसके कुछ पार्ट्स निकाल खेल भी कर लिए। मम्मी कल शायद इसे कबाड़ में बेचने वाली थी, लेकिन मैंने बोला कि इसे अपने साथ रखना चाहिए। तो मम्मी हँस पड़ी। अरे भई, लोग यही सब देखने तो म्यूज़ियम जाते हैं। इसलिए मैंने भी सोच लिया है कि घर में पुराने सामानों की एक आर्काइव बना लेनी चाहिए। होनी भी चाहिए, इतिहास बन रहे चीज़ों को अपने- अपने स्तर पर संजोया जाना ज़रूरी है। इसी पर कमेंट्री सुनते- सुनते कभी सचिन जैसा बनने का ख़्वाब भी आ जाया करता था। क्रिकेट मैच सुनने में पापा का अच्छा साथ मिलता था। 2007 के क्रिकेट वर्ल्ड कप में श्रीलंका के साथ लीग मैच में 2 बज...

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को मेरा खुला पत्र।

माननीय मुख्यमंत्री,                      मैं साकेत आनंद, बेगूसराय, बिहार का रहने वाला हूँ। अभी मैं भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली से पत्रकारिता की पढ़ाई कर निकला हूँ। मैं आपको बिहार के शिक्षा व्यवस्था के बारे में अवगत कराना चाहता हूँ। हर साल बोर्ड परीक्षा के परिणाम आने के बाद बिहार के शिक्षा व्यवस्था की देश भर में आलोचना होती है। और पिछले दो सालों में शिक्षा माफिया और अंदरूनी व्यवस्था से आप भी काफ़ी अवगत हो चुके हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि ऐसे हालत देश के और भी कई राज्यों में हैं। लेकिन बिहार की स्थिति के बारे में आप और हम सभी जानते हैं। पिछले साल भी मैट्रिक की परीक्षा में कुल 15 लाख छात्रों में साढे आठ लाख छात्र फ़ेल हो गए थे। और इंटरमीडिएट के रिज़ल्ट और टॉपर घोटाले की बात भी किसी से छिपी नहीं थी। इस बार भी इंटरमीडिएट के रिज़ल्ट आपने और हम सभी ने देखें। इन सब खुलासों के बाद मीडिया उसे अपने एंटरटेनमेंट की स्टोरी के रूप में परोसने को तैयार बैठा रहता है। इसके बावजूद आप अधिकारियों के ट्रांसफर के अलावे शिक्षा के मूलभूत सुधार के लिए...

प्रेस फ़्रीडम रैंकिंग में भारत

मैंने पिछले साल एक लेख में लिखा था कि 'हमारी मीडिया को अपने एक्सपोज़र और वाइट बैलेंस फिर से ठीक करने की ज़रूरत है। साथ ही अपने ज़ूम लेंस को बढ़ाने की भी, ताकि वह अपने संकीर्णता से बाहर आ सके।' आज इसकी अहमियत और दायरे विश्व के सभी देशों को है। लेकिन भारत में प्रत्यक्ष रूप से देखने पर हालात समझ में आती है। क्योंकि अब भारतीय मीडिया की हालत वैश्विक परिप्रेक्ष्य में लगातार ख़राब होती जा रही है। लोकतांत्रिक मूल्यों पर खड़े उतरने वाले भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, मलेशिया, मैक्सिको, अमेरिका, श्रीलंका जैसे देशों की रैंकिंग प्रेस की आज़ादी के मामले में काफ़ी पिछड़ी हुई है। प्रेस की आज़ादी में पिछड़ना लोकतांत्रिक मूल्यों पर भी सवाल खड़ा करता है। अंतरराष्ट्रीय संस्था 'रिपोर्ट्स विदाउट बॉर्डर्स' के द्वारा जारी की गई 2017 के वर्ल्ड प्रेस फ़्रीडम रैंकिंग में भारत की रैंकिंग 133 से घटकर 136 हो गई। इसमें कोई शक नहीं कि यहां पत्रकारों पर किस रूप में हमले होते रहे हैं। पिछले साल बिहार और झारखंड में पत्रकार की हत्या से लेकर संस्थान के अंदर की आज़ादी के बारे में आपको कॉरपोरेट मीडिया के कर्मचारी ही ...

बेहाल किसान, मौन हुक़्मरान!

14 मार्च से शुरू हुआ तमिलनाडु के किसानों का आंदोलन अभी भी उसी सुषुप्त अवस्था में है। एक महीने से ज़्यादा का समय बीत चुका है, लेकिन इस बार जंतर- मंतर से उठने वाली आवाज़ दबी पड़ी है। बड़े- बड़े आंदोलनों, हर राज्यों की समस्याओं, भ्रष्टाचार से लेकर शिक्षण संस्थानों की समस्याओं का गवाह रही जंतर- मंतर इस बार किसानों को लेकर शांत है। 100- 150 की संख्या में आए तमिलनाडु के किसानों ने पिछले एक महीने में विभिन्न तरीकों से अपनी आवाज़ दिल्ली में बैठे बहरे हुक्मरानों को सुनाने की कोशिश की, जो किसानों को सिर्फ़ अपने- अपने चुनावी फ़सल समझकर काटते आए हैं। कभी आत्महत्या कर चुके साथी किसानों के नरमुंड को गले में लटकाकर, तो कभी अपने सर के आधे बाल का मुंडन करवाकर ये किसान शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे हैं। ये नरमुंड भी उन्हीं किसानों के हैं, जो दो साल पहले इनके साथ क़र्ज़ माफ़ी के लिए दिल्ली आकर सरकार से गुहार लगाते थे। अफ़सोस उनके चले जाने के बाद भी स्थिति वही है। सरकार का ध्यान खींचने के लिए प्रदर्शनकारी किसान चूहों और सांप को मुंह में रख रहे हैं, नंगी सड़क पर खाना खा रहे हैं, गांधी की तस्वीरों को भी ग...

नजीब की माँ!

नजीब को जेएनयू से ग़ायब हुए कल पूरे 5 महीने हो गए, लेकिन अभी तक उसका कुछ पता नहीं चल पाया है। जब भी नजीब की माँ बदायूँ से जेएनयू आती है, तो इसी उम्मीद में कि वो इस बार नजीब को साथ लेकर जाएगी। अब तक वह असफ़ल रही हैं, लेकिन हिम्मत की कमी नहीं है। उनकी इस लड़ाई में जेएनयू के छात्रों ने गज़ब का साथ दिया है। ग्रामीण इलाकों में ग़रीबों और पिछड़ों के लिखवाए गए एफआईआर को ख़ुद ही वापस ले लेना होता है। मैं यह सोच कर सहम जाता हूँ कि वो माँ दिन में कितनी बार नजीब के लिए रोती होगी। नजीब के लिए न्याय की मांग अब धुंधली नज़र आने लगी है। कल शाम जेएनयू में साबरमती ढ़ाबे पर जब वो बोल रही थी, तो वहाँ पहले की अपेक्षा कम भीड़ जुटी थी। शायद छात्रों ने अब उम्मीद लगानी छोड़ दी है, लेकिन नजीब की माँ आज भी पूरे सिस्टम से लड़ने को तैयार है। उसमें वह हम छात्रों की भागीदारी को अहम मानती है। जेएनयू के छात्र नजीब को वापस लाने की लड़ाई लगातार लड़ रहे हैं। उनका मानना है कि अगर छात्र इस देश की सत्ता के ख़िलाफ़ एक साथ खड़े हो गए, तो फिर इतिहास बदल सकता है। सच्चाई और इंसाफ़ की लड़ाई लड़ने के लिए वह किसी भी ताकत से लड़ने को तैयार हैं। ...

I_Stand_With_Academic_Freedom

शिक्षण संस्थानों पर हो रहे हमलों पर आवाज़ हमेशा उठती रहेगी। अभिव्यक्ति की आज़ादी को रोकने पर हर छात्र को खड़ा होना चाहिए। चाहे वह देश के किसी भी कोने में पढ़ रहा हो। किसी भी संस्थान में गुंडागर्दी को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है, चाहे वह एफटीआईआई और आईआईएमसी जैसी कम छात्रों वाली छोटी- सी जगह क्यों न हो। पिछले 2- 3 दिनों से जो दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज में हुआ, वह बहुत ही शर्मनाक है। जिस तरह की मारपीट छात्रों के द्वारा हुई, इससे लगता है कि यह एक सोची- समझी साजिश थी। क्योंकि पूरा मामला ही उमर खालिद के व्याख्यान को रोकने के बाद शुरू हुआ। आज जामिया के छात्रों के द्वारा विरोध- प्रदर्शन में शामिल होकर समझने की कोशिश किया। वहाँ रामजस कॉलेज की एक छात्रा ने कहा कि किस तरह लड़कियों को धमकाया और डराया जा रहा है। उन्हें रेप और एसिड अटैक तक की धमकी तथाकथित गुंडों के द्वारा दी गई है। मैं इन बातों की पुष्टि नहीं करता हूँ, लेकिन जिस तरह मारपीट के वीडियो सामने आए हैं उससे लगता है कि छात्र पढ़ने वाले तो नहीं हैं। वो कुछ और ही करना चाहते हैं। सरकार और दिल्ली पुलिस को आरोपियों पर सही और सख़्त तरी...

करियर, बिहार और बातचीत!

"कहाँ उलझे हुए हो इन सब चीजों में, कुछ अच्छी नौकरी करो! पूरा मीडिया तो बिका हुआ है। बिहार के लोग तो बहुत तेज होते हैं। मैंने देखा है कि शारीरिक और मानसिक दोनों तरीके से आप लोग काफ़ी मज़बूत होते हैं। आइएएस भी तो आप ही के यहाँ से बहुत बनते हैं।" यह वाक्या एक बड़े अधिकारी ने मुझसे कहा, क्योंकि मैं मीडिया की पढ़ाई कर रहा हूँ। वैसे इस तरह की चीजें कहीं न कहीं से मेरे पास आती रहती हैं। घूमते- फ़िरते कहीं पर भी रूक कर सवाल करना आदत बनती जा रही है। एक दिन पहले, अचानक से भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अंतर्गत काम कर रहे 'केन्द्रीय समाज कल्याण बोर्ड' के दफ्तर पहुँच गया। यह एक स्वायत्त संस्था है, जो कि महिलाओं और बच्चों के लिए कई सारे योजनाओं पर काम करती है। वहाँ एक बड़े अधिकारी से मिला, लगा जैसे कि शायद बात करने के लिए बहुत देर से मेरा इंतज़ार कर रहे हों। बहुत सारी जानकारी भी मिली, लेकिन वो मेरे बारे में जानने के लिए ज़्यादा उत्सुक होने लगे। उन्हें बताया कि मीडिया में आना बचपन का शौक था। इसलिए अब मैं आज का ('सबसे अच्छा' और 'सबसे बुरा') फ़ील्ड के लिए ख़ुद...

फ़िल्म रिव्यू "मदारी"!

फ़िल्म 'मदारी' हमारे पूरे राजनीतिक और प्रशासनिक सिस्टम की शिथिलता को समझाने के लिए बनाई गई और मुझे लगता भी है कि ये फ़िल्म सिस्टम पर बहुत बड़ा तमाचा है। डायरेक्टर निशिकांत कामत ने पूरी कोशिश की है कि हम देश के अंदर व्याप्त भ्रष्टाचार, लालफीताशाही और नेताओं के स्वार्थ को आसानी से समझ सके। फ़िल्म दृश्यम के जैसे ही कामत साहब ने इसे भी थ्रिलर बनाने की कोशिश की है। उनकी ये कोशिश पूरी भी हुई है लेकिन जितनी आसानी से इसे फ़िल्माया गया है ऐसा वाकई में होता नहीं है। बहुत सारे सीन को देखकर दर्शकों को पहले से ही संकेत मिल जाते हैं। फ़िल्म की शुरुआत का एक डायलॉग- "बाज़ चूजे पर झपटा उठा ले गया, कहानी सच्ची लगती है, लेकिन अच्छी नहीं लगती। बाज़ पर पलटवार हुआ कहानी सच्ची नहीं लगती, लेकिन ख़ुदा क़सम बहुत अच्छी लगती है।" हमें बता देता है कि कहानी संघर्ष की है। फ़िल्म की पहली सीन में ही पता चल जाता है कि निर्मल (इरफान ख़ान) गृह मंत्री के बच्चे का अपहरण कर लेता है। उसके बाद के सीन में पूरी अफरा- तफरी को दिखाया जाता है, किस तरह नेता अपहरण के मुद्दे पर मीडिया, विपक्ष हर किसी को शांत करवाने में लग...