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Showing posts from 2016

सरकार की नीयत ही साफ़ नहीं...

  सच्चा है यहाँ कंगाल, तो बेईमान है मालामाल    ये पैसा बोलता है..... 'काला बाज़ार' फ़िल्म के इस पूरे गाने को सुनकर देश की स्थिति को अच्छी तरह से समझ सकते हैं। नोटबंदी की घोषणा हुए 20 दिन हो गए, इस बीच में तरह- तरह की और भी घोषनाएँ हुई जिसने आम लोगों को बैंकों और एटीएम के सामने लंबी क़तारों में लगाए रखा। सियासत तो होनी ही थी, भले ही विपक्ष के पास कोई पुख़्ता सुबूत न हो। उन्हें भी तो जनता के संवेदनाओं के साथ खड़ा रहना है, भले ही वो राजनीति के लिए हो। अब सरकार ने एक और घोषणा की है कि काले धन वाले 50% तक टैक्स देकर अपने पैसे सुरक्षित रख सकते हैं। यानि कि अगर आपके पास 100 करोड़ का काला धन है तो 50% टैक्स के रूप में चुका कर 50 करोड़ रूपये अपने पॉकेट में रख सकते हैं। लगता है कुछ भक्त लोग बच गए थे मोदी जी के घोषणा के पहले पैसे छुपाने में, ये स्कीम तो उन्हीं लोगों के लिए है। जनता को तो मूर्ख समझते ही हैं हमारे हुक़्मरान, इसलिए तो रो कर भी बात करना पड़ता है। ये 30 सितंबर वाली फिर स्कीम क्या थी? ये तो आप उन्हीं से पूछिए। क्या सरकार वाकई अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में लगी है या सिर्फ ...

सब कुछ नहीं खो दिए हम!

कल रवीश कुमार के प्राइम टाइम को देख कर लगा कि लोगों को हमेशा मीडिया के लिए नकारात्मक भाव नहीं रखना चाहिए। मीडिया में आने वाले छात्रों को हमेशा नकारात्मकता को छोड़ ऐसे एपिसोड देखकर सीखते रहना चाहिए। जिस तरह से उन्होंने उत्तर प्रदेश के एक गांव के सरकारी स्कूल में एक शिक्षक की समर्पण भाव और वहाँ के शिक्षा व्यवस्था को दिखाया, वह पूरे भारतवर्ष के लिए प्रेरणास्रोत है। न जाने कितने शिक्षक पूरे भारत में प्रेरित हुए होंगे अपने भविष्य को लेकर। देश में शिक्षा के प्रति लोगों का नजरिया बदलने की ये एक सार्थक कोशिश थी। हमारे देश में शिक्षा की जो विभिन्न परतें बनी हुई है, उसकी यह एक झलक थी लेकिन इसके बावजूद उन बच्चों की प्रतिभा देखने लायक है। पूरे कार्यक्रम को देखकर लगा कि शर्ट पर लगा किसी कंपनी का टैग व्यक्ति की पहचान नहीं हो सकता। मैं चाहता हूँ कि आप सभी सोशल मीडिया पर एक बार इस एपिसोड को जरूर देखें। मैं आजकल सभी छात्रों को मीडिया के एक ही पहलू पर चर्चा करते हुए देखता हूँ। जबकि उनके लिए तमाम विकल्प खुले हुए हैं, जरूरत है चीजों को ढूंढने और समझने की। भारत में तमाम ऐसी समस्याएं हैं जो आजादी के ब...

शुक्रिया दोस्तों एक सुखद अहसास देने के लिए!

मेरे प्यारे काॅलेज के दोस्तों,                              याद कीजिए, साल 2013 के काॅलेज की शुरुआत कितने धूम धड़ाके से हुई थी। हर कोई एक- दूसरे को जानने के बाद खुशी से बहुत सारे वादे कर बैठता था। हर किसी के आँखों में उम्मीद की नई रोशनी थी। हर कोई एक अलग हुनर और प्रतिभा के साथ काॅलेज में दाखिला लिया था। हमलोग सभी पहली बार कैमरा, माइक और स्टूडियो का साथ पाकर झूम उठे थे, लगा था कि शरीर में दो हाथ के साथ दो पंख भी लग गए हैं। इन सब के साथ हर कोई दोस्ती की नई परिभाषा भी गढ रहे थे। काॅलेज की आवोहवा ने इसे गढने में पूरी मदद भी की। कैंटीन में दोस्तों के साथ चाय पीने और सिनेमा हाॅल से लेकर राँची के माॅल ने कभी मस्ती और दोस्ती में कमी नहीं होने दिया। पढ़ाई के साथ- साथ मौज- मस्ती भी जुड़ते चली गई और पहला साल अचानक कब खत्म हुआ, किसी को पता भी नहीं चला। साल 2013 में हमारी संख्या 53 थीं, वहीं जेवियर्स के कड़े नियम ने हमें 37 में तब्दील कर दिया। उन सबको भी मैं बेहतर भविष्य की अग्रिम शुभकामनाएँ दे रहा हूँ जो हमारे साथ आगे नह...

जेनेरेशन गैप या कम्यूनिकेशन गैप ??

आज से 5-6 दिन पहले मेरे दिल को एक गहरा आघात पहुँचा था, जो अब तक मेरे दिल और दिमाग को घेरे हुए है। इसकी बहुत सारी वजहें बनी; आज के दौर के व्यस्त अभिभावक, तानाशाही शिक्षकों की क्रूरता, हमारी स्कूलिंग सिस्टम, समाज की संकीर्णतावादी सोच आदि। सबसे बड़ी वजह थी कि राँची के एक छठी कक्षा के लड़के ने आत्महत्या कर ली। उसकी उम्र महज 11- 12 साल की थी। अख़बार में छपी ख़बर के अनुसार वह डीएवी पुंदाग का छात्र था और अपने होमवर्क वाले डायरी न मिलने के कारण काफी निराश था। इसी डर के कारण उसने खुदकुशी कर ली। खुदकुशी की जो भी वजहें रही हो लेकिन इस घटना ने समाज में एक भय का माहौल जरूर बना दिया। क्या एक छोटा- सा बच्चा भी इस तरह के फैसले ले सकता है जिससे वो अपनी बहुमूल्य जिंदगी को ही गँवा बैठे? सवाल है कि इन सबके बीच माँ- बाप कहाँ है? इस बच्चे के अभिभावक ने बताया कि वो होमवर्क डायरी न मिलने से काफी डर गया था और रात में इसी डर के साथ वो अपने बिस्तर पर गया, फिर सुबह........। किसी व्यक्ति ने आत्महत्या का रास्ता क्यों चुना, इस प्रश्न का उत्तर खोज पाना तो कठिन रहा ही है, लेकिन जब एक छोटा- सा बच्चा इस तरह के कदम उठा...

मंदिर, मस्जिद और महिलाएँ !

तीन महीने पहले जब शनि सिंगनापुर मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर विवाद छिड़ा था तो लगा कि हम अब भी कितने पीछे हैं। हमारी सोच कितनी पीछे ही नहीं, बहुत ओछी भी है। यह हमारे देश का दुर्भाग्य ही है कि हमारी माँ, बहने और बेटियाँ मंदिरों और मस्जिदों में जाने के लिए भी संघर्ष कर रही है। असल जिंदगी में तो वे जंग लड़ती ही रही हैं। अधिकार के साथ- साथ उनकी आस्था और भक्ति की भावनाओं को भी आहत पहुँच रही है। क्या बिना संघर्ष और हंगामे के महिलाएँ जी नहीं सकती? क्या बिना सड़क पर उतरे वे मंदिरों और मस्जिदों में प्रवेश नहीं कर सकती? क्या बिना दहेज के लड़कियाँ ब्याही नहीं जा सकती? क्या बिना माँग के हम उनका हक और आरक्षण नहीं दे सकते? क्या इसके लिए भी संसद में बिल पेश करने की जरूरत होनी चाहिए? यह सब हमारे सामाजिक सोच की एक गंदी उपज है। कोई शास्त्र या वेद तो नहीं कहता है कि पुरुष अपने अनुसार महिलाओं को चलाए या फिर उसके आस्था और भक्ति पर ही रोक लगा दे। जनवरी 2016 में तृप्ति देसाई ने मंदिरों में लैंगिक भेदभाव को लेकर जब राष्ट्रीय बहस छेड़ा, तो ज्ञात हुआ कि देश के बड़े- बड़े मंदिर और मस्जिद जो कि विश्व प्...