इस आवाज़ के साथ शायद आपकी भी ज़िन्दगी का कुछ हिस्सा गुजरा हो। घर में कल पुराने दोस्त से मुलाक़ात हुई, तो सबसे पहले यही याद आया। काफ़ी समय तक इसने मेरा साथ दिया था। दादाजी(बाबा) होते तो इसका पूरा इतिहास अच्छे से बता देते। अनुमान लगा रहा हूँ कि ये 30 साल से भी ज़्यादा पुराना है। क्योंकि मैं बचपन से इसके साथ हूँ। दादी बता रही है कि बाबा ने उस समय इसे 600 रूपए में ख़रीदा था। इससे ज़्यादा उनको भी कुछ याद नहीं है। अब तो ये ख़राब हो चुका है, बच्चों ने इसके कुछ पार्ट्स निकाल खेल भी कर लिए। मम्मी कल शायद इसे कबाड़ में बेचने वाली थी, लेकिन मैंने बोला कि इसे अपने साथ रखना चाहिए। तो मम्मी हँस पड़ी। अरे भई, लोग यही सब देखने तो म्यूज़ियम जाते हैं। इसलिए मैंने भी सोच लिया है कि घर में पुराने सामानों की एक आर्काइव बना लेनी चाहिए। होनी भी चाहिए, इतिहास बन रहे चीज़ों को अपने- अपने स्तर पर संजोया जाना ज़रूरी है। इसी पर कमेंट्री सुनते- सुनते कभी सचिन जैसा बनने का ख़्वाब भी आ जाया करता था। क्रिकेट मैच सुनने में पापा का अच्छा साथ मिलता था। 2007 के क्रिकेट वर्ल्ड कप में श्रीलंका के साथ लीग मैच में 2 बज...