Skip to main content

Posts

Showing posts from October, 2017

नास्तिकता ही भविष्य

पिछले कई दशकों से भारत में धर्म और धार्मिक पाखंड के ख़िलाफ़ जागरूकता बड़े स्तर पर नहीं चलाई गई है या इसके ख़िलाफ़ लड़ाई नहीं लड़ी गई है। कम से कम आज़ादी के बाद तो बिल्कुल भी नहीं। कई छोटे- छोटे प्रयास हुए, लेकिन वे कारगर साबित नहीं हुए। तो ऐसे वक़्त में जब धार्मिक राजनीति देश के ऊपर सर से बह रही है, ज़रूरत है कि हम नास्तिकता के प्रचार- प्रसार को बढ़ावा दें और तर्कपूर्ण तरीके से लोगों के अंदर वैज्ञानिक सोच को विकसित कर पाएं। क्योंकि नास्तिकता ही समाज और मानव के संपूर्ण विकास में अंततः सहायक साबित होगा। पूरी दुनिया में क़रीब 80- 85 करोड़ लोग नास्तिक हैं, जिनमें ज़्यादातर एशिया के बाहर के देश हैं। यूरोप के सबसे विकसित देशों में 80 प्रतिशत तक नास्तिक लोग रहते हैं। वहां धार्मिक प्रभाव मानवीय विकास में गतिरोध नहीं बनते हैं। जबकि भारत की आबादी का बहुत कम या न के बराबर नास्तिकता को मानता है(0.50% के आसपास)। हमारी सामाजिक संरचना को ही इस तरीके गढ़ दिया गया है कि हम उसे तोड़ नहीं पाते। अंबेडकर और भगत सिंह को पढ़ तो लेते हैं, लेकिन वे क्या बताना चाहे, उसे जीवन में उतारने को तैयार नहीं हैं। मानसिक ग़ुलामी स...