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Showing posts from December, 2017

नास्तिकता पार्ट-2

आप/तुम क्या हैं/हो? बस इतना ही समझ लीजिए कि आप कुछ भी नहीं हैं। जब आपके जीवन जीने के अधिकतर सोच दूसरों के दिए हुए हों, तो आपकी अपनी व्यक्तित्व ही डुप्लीकेट है। आप अपने परिवार, समाज के द्वारा फ़ैलाए गए चादर में ढके हुए एक व्यक्ति हैं और आप कहते हैं कि आप 'आप' हैं। जब तक आप उस चादर को हटाकर ख़ुद से साक्षात्कार नहीं करते, मैं नहीं समझूंगा कि ये आप हैं। आप अपनी विशिष्टता दूसरों को ख़ुश या दुखी करने में दिखाते हैं, न कि तार्किक होने में। आपको बताया गया है कि एक भगवान है, आपने मान लिया। बताया गया कि चार हैं, आपने वो भी मान लिया। आप कभी भी अपने हिंदू, मुस्लिम, जाति विशेष होने पर परिवार या समाज पर सवाल नहीं उठाते। उस पर बिना प्रश्न चिह्न खड़े किए उसको पोषते हैं। जो इन चीज़ों को ग़लत भी समझते हैं (या नहीं मानते), इसके बावजूद मुर्दाशांति से भर कर पूरा जीवन जी लेते हैं। क्योंकि उन्हें इतने बड़े सामाजिक व्यवस्था के ख़िलाफ़ जाने में घबराहट होती है। वे अपना खाल नहीं उतारना चाहते हैं। मैं तुम्हारे धार्मिक भावनाओं पर ठेस पहुंचाने आया हूँ, क्योंकि जब तक ठेस नहीं पहुंचेगा कुछ नया नहीं होगा। मैं ...