जब भी मैं धर्म और पाखंड पर बात करता हूं, तो लोग मुझे नास्तिक बोलकर छुटकारा पाने की कोशिश करते हैं। लेकिन वो ख़ुद पाखंड को कुरीति मानकर भी छुटकारा पाने के बदले उसे ढोते रहते हैं। नास्तिकता का डिबेट कोई नया नहीं है। अगर आप अपने भगवान, अल्लाह या किसी ऐसी काल्पनिक शक्ति के बारे में एक तर्क देंगे, तो मैं अपने विचार पर दोबारा सोचने की कोशिश ज़रूर करूंगा। धर्म के ख़िलाफ़ बोलने पर धार्मिक व्यक्ति को बुरा लगना स्वभाविक है। क्योंकि उसकी पूरी जीवनशैली उससे जुड़ी होती है। भगवान को ना मानने वाले लोग धर्म को चुनौती देते हैं, उसकी खामियों को सामने रखते हैं। हज़ारों सालों से जो चीज़ हम पर थोपा गया है, उससे बाहर निकलने की कोशिश करते हैं और इसमें कोई बुराई नहीं है। समाज बहुत सारी चीज़ों को तोड़कर बाहर आया है, जिसको लोग धर्म के हिसाब से अपनी संस्कृति और सभ्यता मानते थे। सती प्रथा हो, समलैंगिकता हो, तीन तलाक हो, व्यभिचार हो, महिलाओं का खतना हो या उन्हें घर तक सीमित रखना हो, ये सब समय के साथ बदले हैं। लेकिन इनका जड़ कहां था, धर्म में ही ना। इन सबको जस्टिफाई करने के लिए हमेशा धर्म और ईश्वरीय क़ानून का हवाल...