Skip to main content

Posts

Showing posts from April, 2017

प्रेस फ़्रीडम रैंकिंग में भारत

मैंने पिछले साल एक लेख में लिखा था कि 'हमारी मीडिया को अपने एक्सपोज़र और वाइट बैलेंस फिर से ठीक करने की ज़रूरत है। साथ ही अपने ज़ूम लेंस को बढ़ाने की भी, ताकि वह अपने संकीर्णता से बाहर आ सके।' आज इसकी अहमियत और दायरे विश्व के सभी देशों को है। लेकिन भारत में प्रत्यक्ष रूप से देखने पर हालात समझ में आती है। क्योंकि अब भारतीय मीडिया की हालत वैश्विक परिप्रेक्ष्य में लगातार ख़राब होती जा रही है। लोकतांत्रिक मूल्यों पर खड़े उतरने वाले भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, मलेशिया, मैक्सिको, अमेरिका, श्रीलंका जैसे देशों की रैंकिंग प्रेस की आज़ादी के मामले में काफ़ी पिछड़ी हुई है। प्रेस की आज़ादी में पिछड़ना लोकतांत्रिक मूल्यों पर भी सवाल खड़ा करता है। अंतरराष्ट्रीय संस्था 'रिपोर्ट्स विदाउट बॉर्डर्स' के द्वारा जारी की गई 2017 के वर्ल्ड प्रेस फ़्रीडम रैंकिंग में भारत की रैंकिंग 133 से घटकर 136 हो गई। इसमें कोई शक नहीं कि यहां पत्रकारों पर किस रूप में हमले होते रहे हैं। पिछले साल बिहार और झारखंड में पत्रकार की हत्या से लेकर संस्थान के अंदर की आज़ादी के बारे में आपको कॉरपोरेट मीडिया के कर्मचारी ही ...

बेहाल किसान, मौन हुक़्मरान!

14 मार्च से शुरू हुआ तमिलनाडु के किसानों का आंदोलन अभी भी उसी सुषुप्त अवस्था में है। एक महीने से ज़्यादा का समय बीत चुका है, लेकिन इस बार जंतर- मंतर से उठने वाली आवाज़ दबी पड़ी है। बड़े- बड़े आंदोलनों, हर राज्यों की समस्याओं, भ्रष्टाचार से लेकर शिक्षण संस्थानों की समस्याओं का गवाह रही जंतर- मंतर इस बार किसानों को लेकर शांत है। 100- 150 की संख्या में आए तमिलनाडु के किसानों ने पिछले एक महीने में विभिन्न तरीकों से अपनी आवाज़ दिल्ली में बैठे बहरे हुक्मरानों को सुनाने की कोशिश की, जो किसानों को सिर्फ़ अपने- अपने चुनावी फ़सल समझकर काटते आए हैं। कभी आत्महत्या कर चुके साथी किसानों के नरमुंड को गले में लटकाकर, तो कभी अपने सर के आधे बाल का मुंडन करवाकर ये किसान शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे हैं। ये नरमुंड भी उन्हीं किसानों के हैं, जो दो साल पहले इनके साथ क़र्ज़ माफ़ी के लिए दिल्ली आकर सरकार से गुहार लगाते थे। अफ़सोस उनके चले जाने के बाद भी स्थिति वही है। सरकार का ध्यान खींचने के लिए प्रदर्शनकारी किसान चूहों और सांप को मुंह में रख रहे हैं, नंगी सड़क पर खाना खा रहे हैं, गांधी की तस्वीरों को भी ग...