मैंने पिछले साल एक लेख में लिखा था कि 'हमारी मीडिया को अपने एक्सपोज़र और वाइट बैलेंस फिर से ठीक करने की ज़रूरत है। साथ ही अपने ज़ूम लेंस को बढ़ाने की भी, ताकि वह अपने संकीर्णता से बाहर आ सके।' आज इसकी अहमियत और दायरे विश्व के सभी देशों को है। लेकिन भारत में प्रत्यक्ष रूप से देखने पर हालात समझ में आती है। क्योंकि अब भारतीय मीडिया की हालत वैश्विक परिप्रेक्ष्य में लगातार ख़राब होती जा रही है। लोकतांत्रिक मूल्यों पर खड़े उतरने वाले भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, मलेशिया, मैक्सिको, अमेरिका, श्रीलंका जैसे देशों की रैंकिंग प्रेस की आज़ादी के मामले में काफ़ी पिछड़ी हुई है। प्रेस की आज़ादी में पिछड़ना लोकतांत्रिक मूल्यों पर भी सवाल खड़ा करता है। अंतरराष्ट्रीय संस्था 'रिपोर्ट्स विदाउट बॉर्डर्स' के द्वारा जारी की गई 2017 के वर्ल्ड प्रेस फ़्रीडम रैंकिंग में भारत की रैंकिंग 133 से घटकर 136 हो गई। इसमें कोई शक नहीं कि यहां पत्रकारों पर किस रूप में हमले होते रहे हैं। पिछले साल बिहार और झारखंड में पत्रकार की हत्या से लेकर संस्थान के अंदर की आज़ादी के बारे में आपको कॉरपोरेट मीडिया के कर्मचारी ही ...