जब भी मैं धर्म और पाखंड पर बात करता हूं, तो लोग मुझे नास्तिक बोलकर छुटकारा पाने की कोशिश करते हैं। लेकिन वो ख़ुद पाखंड को कुरीति मानकर भी छुटकारा पाने के बदले उसे ढोते रहते हैं। नास्तिकता का डिबेट कोई नया नहीं है। अगर आप अपने भगवान, अल्लाह या किसी ऐसी काल्पनिक शक्ति के बारे में एक तर्क देंगे, तो मैं अपने विचार पर दोबारा सोचने की कोशिश ज़रूर करूंगा। धर्म के ख़िलाफ़ बोलने पर धार्मिक व्यक्ति को बुरा लगना स्वभाविक है। क्योंकि उसकी पूरी जीवनशैली उससे जुड़ी होती है। भगवान को ना मानने वाले लोग धर्म को चुनौती देते हैं, उसकी खामियों को सामने रखते हैं। हज़ारों सालों से जो चीज़ हम पर थोपा गया है, उससे बाहर निकलने की कोशिश करते हैं और इसमें कोई बुराई नहीं है। समाज बहुत सारी चीज़ों को तोड़कर बाहर आया है, जिसको लोग धर्म के हिसाब से अपनी संस्कृति और सभ्यता मानते थे। सती प्रथा हो, समलैंगिकता हो, तीन तलाक हो, व्यभिचार हो, महिलाओं का खतना हो या उन्हें घर तक सीमित रखना हो, ये सब समय के साथ बदले हैं। लेकिन इनका जड़ कहां था, धर्म में ही ना। इन सबको जस्टिफाई करने के लिए हमेशा धर्म और ईश्वरीय क़ानून का हवाल...
आप कभी ऐसी यात्रा/सफ़र पर गए हैं, जहां से आपको लौटने का मन नहीं करता हो। यशपाल का यह कालजयी उपन्यास 'झूठा सच' ऐसी ही किसी यात्रा पर लेकर चला जाता है। विभाजन की त्रासदी पर तत्कालीन समाज, वर्ग भेद और राजनीतिक-सांस्कृतिक घटनाओं को इतनी बारीकी से समेटकर बताना वाकई अद्भुत है। 960 से ज़्यादा पन्नों के इस उपन्यास में भी नारीवादी विचार, वर्ग संघर्ष, वैवाहिक जीवन, प्रेम, राजनीति, सामाजिक जड़ता, इन्हीं विषयों के आसपास कहानी चलती रहती है। विभाजन और उसके बाद की परिस्थितियों पर हम जो कुछ भी एकेडमिक किताबों में पढ़ते हैं, उसमें राजनीतिक चर्चाएं ज़्यादा होती हैं। राजनीतिक इतिहास में समाज का भीतरी सच छूट जाता है। इसलिए सामाजिक और सांस्कृतिक पहलुओं को समझने के लिए साहित्यकारों और पत्रकारों के बीच से गुजरना होता है। यशपाल ने इस उपन्यास में ऐसे ही तीन-चार मुख्य किरदारों को केंद्र में रखकर पहले सांप्रदायिक तनावों, आर्थिक-सामाजिक परिदृश्यों और फिर लाहौर से आए शरणार्थियों की समस्याओं, महिलाओं के साथ यौनिक हिंसा और बदलती राजनीति को हूबहू रख देते हैं। उपन्यास में जयदेव और तारा मुख्य किरदार हैं। अपने आदर्शो...