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Showing posts from 2018

न्यायालय से नहीं, अंधविश्वास को दूर फेंकने के बाद मिलेगा दाभोलकर को न्याय!

नरेन्द्र दाभोलकर की हत्या को कल (20 अगस्त) 5 साल हो जाएंगे, लेकिन अब तक सीबीआई और पुलिस नाकाम है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने सीबीआई को हाल ही में फ़टकार लगाई थी। सीबीआई हत्या मामले में बार-बार एक ही स्टेटस रिपोर्ट कोर्ट में सौंप रही है। राजनीतिक दबाव जांच एजेंसियों की नई पहचान है। गुजरात के सारे मामलों में देख सकते हैं। हो सकता है कि यह भी किसी के दबाव में करवाया जा रहा हो। क्योंकि कोर्ट की कई चेतावनियों और समयसीमा के बाद भी सीबीआई हाथ खड़ी की हुई है। हालांकि कल एक व्यक्ति को गिरफ़्तार किया गया, जिसे महाराष्ट्र एटीएस और सीबीआई मुख्य संदिग्ध (आरोपी) बता रही है। इस समाज में एक बने बनाए ढर्रे पर न चलने का क्या हश्र किया जा सकता है, वही दाभोलकर के साथ हुआ था। सबके साथ हो रहा है। पिछले 5 सालों में कलबुर्गी, पानसरे, गौरी... अभी उमर खालिद और स्वामी अग्निवेश पर जानलेवा हमला हुआ था। अगला नंबर आपका और मेरा हो सकता है। गालियां तो पड़ती ही रहती हैं। अपना पूरा जीवन अंधविश्वास को ख़त्म करने में लगा देने वाले दाभोलकर को इस समाज ने क्या दिया? क्या हमनें उनके कामों को आगे बढ़ाया? उनका जीवन सीखने लाय...

कॉरपोरेट और सरकार की चोरी, जनता से सीनाजोरी

वेदांता वही कंपनी है जिसने ओडिशा में यूनिवर्सिटी खोलने के नाम पर राज्य सरकार के साथ मिलकर चोरी छिपे क़रीब 6000 एकड़ ज़मीन हड़पने की कोशिश की थी। साल 2006 में बीजू जनता दल (बीजद) सरकार ने हर क़ानून को ताक पर रखकर 4000 एकड़ ज़मीन अधिग्रहण कर वेदांता फ़ाउंडेशन को दे भी दी थी। लोगों के कड़े विरोध के बाद उड़ीसा हाई कोर्ट ने ज़मीन अधिग्रहण पर रोक लगा दी थी। मामला अभी भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। यह ज़मीन पुरी-कोणार्क मरीन ड्राइव (ओडिशा तट) पर है जहां 1.82 मिलियन टन थोरियम युक्त मोनेजाइट का भंडार मिला था। इतनी ज़मीन में क़रीब 18 गांव आते हैं। 2004 और 2009 के चुनावों में वेदांता ने बीजद के लिए भरपूर पैसा लगाया था। इसलिए यूनिवर्सिटी के नाम पर अवैध तरीके से ज़मीन हड़प कर कारोबार को फलने-फूलने दिया जाना था। पिछले साल अक्टूबर महीने में ही वेदांता की इस प्रस्तावित यूनिवर्सिटी के अध्यक्ष बिजय पटनायक ने इस्तीफा देते हुए कहा था कि यूनिवर्सिटी कोई इंडस्ट्री नहीं है। इसे किराए के मकान में भी शुरू किया जा सकता है। सही बात है, जेएनयू जैसी बड़ी यूनिवर्सिटी 1000 एकड़ के आस-पास में फैली हुई है। उसमें भी...

झारखंड का बजट, सरकार की नाकामी

झारखंड सरकार ने कल 2018-19 के लिए 80,200 करोड़ रुपये का बजट पेश किया, जो कि राज्य की आबादी और अर्थव्यवस्था के हिसाब से काफ़ी और बढ़िया है। यह राशि पिछली बार के बजट से स्पष्टत: ज़्यादा है। पिछले साल रघुबर जी ने 75 हज़ार करोड़ का बजट पेश किया था, जिसका मुश्किल से अब तक 40 फ़ीसदी भी खर्च नहीं हो पाया। रघु कह रहे हैं कि अगले तीन महीने में पूरी राशि ख़र्च हो जाएगी। भईया राज्य की जनता को शॉपिंग थोड़ी करवानी है जो ख़र्च हो जाएगी। बोलिए कि ये आपकी नाकामी है। आप अपनी मशीनरी को बेहतर बनाने में 3 साल बाद भी असफ़ल है। वैसे रघुबर जी भी '2022' तक झारखंड की समस्याएं ख़त्म करने की बात करते रहते हैं। 'आदिवासियों का विकास' जैसे जुमले भी आए हैं। जुमले इसलिए क्योंकि ज़मीन पर काम कीड़ों की तरह सड़ती रहती हैं। पिछले 17 साल से सब दे रहे हैं। सरकार ने हर क्षेत्र में बजट की राशि को कुछ प्रतिशत तक बढ़ाया है। शिक्षा में पिछले साल के मुकाबले 6.31% बढ़ाकर राशि 11,181 करोड़ हो गई। पूरे बजट का लगभग 13% (मोटामोटी) होगा, लेकिन सोचिए कि इतनी बड़ी राशि जाती कहां है। इतना ही समझिए कि बिहार की जो हालत है ठीक वही यहां के स...