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बेहाल किसान, मौन हुक़्मरान!

14 मार्च से शुरू हुआ तमिलनाडु के किसानों का आंदोलन अभी भी उसी सुषुप्त अवस्था में है। एक महीने से ज़्यादा का समय बीत चुका है, लेकिन इस बार जंतर- मंतर से उठने वाली आवाज़ दबी पड़ी है। बड़े- बड़े आंदोलनों, हर राज्यों की समस्याओं, भ्रष्टाचार से लेकर शिक्षण संस्थानों की समस्याओं का गवाह रही जंतर- मंतर इस बार किसानों को लेकर शांत है। 100- 150 की संख्या में आए तमिलनाडु के किसानों ने पिछले एक महीने में विभिन्न तरीकों से अपनी आवाज़ दिल्ली में बैठे बहरे हुक्मरानों को सुनाने की कोशिश की, जो किसानों को सिर्फ़ अपने- अपने चुनावी फ़सल समझकर काटते आए हैं। कभी आत्महत्या कर चुके साथी किसानों के नरमुंड को गले में लटकाकर, तो कभी अपने सर के आधे बाल का मुंडन करवाकर ये किसान शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे हैं। ये नरमुंड भी उन्हीं किसानों के हैं, जो दो साल पहले इनके साथ क़र्ज़ माफ़ी के लिए दिल्ली आकर सरकार से गुहार लगाते थे। अफ़सोस उनके चले जाने के बाद भी स्थिति वही है।

सरकार का ध्यान खींचने के लिए प्रदर्शनकारी किसान चूहों और सांप को मुंह में रख रहे हैं, नंगी सड़क पर खाना खा रहे हैं, गांधी की तस्वीरों को भी गले में लटका रहे हैं और 11 अप्रैल को तो किसानों ने गुस्से में पीएम आवास के सामने नग्न प्रदर्शन तक भी किया। लेकिन इन सबके बाद भी स्थिति जस की तस है। प्रधानमंत्री आवास, संसद भवन, राष्ट्रपति भवन के 1.5- 2 किलोमीटर के दायरे में किसान इस तरह रो रहे हैं, सड़कों पर सो रहे हैं, लेकिन किसानों के मसीहा बनने वाले राजनेता आंख और कान बंद किए बैठे हैं। विपक्षी पार्टियां भी इस मुद्दे को नहीं उठा रही हैं, क्योंकि अभी चुनावी सीजन ख़त्म हो चुका है। कुछ राजनेता यहां आकर फ़ोटो ज़रूर खिंचवा ले रहे हैं। और वैसे भी कर्नाटक में कांग्रेस(मुख्य विपक्षी पार्टी) की सरकार है, जहां तमिलनाडु से ज़्यादा संख्या में किसान आत्महत्या कर रहे हैं। कोई भी राजनीतिक पार्टी या मीडिया इनकी आवाज़ बनने को तैयार नहीं है। मीडिया न के बराबर ही रिपोर्ट कर रही है, शायद उसे इसमें टीआरपी की उम्मीद कम लग रही हो। किसानों का हिन्दी में संवाद न कर पाना एक बड़ी समस्या बनी, लेकिन तमिलनाडु से युवा आकर इनका साथ दे रहे हैं। दिल्ली में लगातार बढ़ रही गर्मी भी आंदोलन में समस्याएं पैदा कर रही है।


समस्याएं—
तमिलनाडु के कई ज़िले इस बार भी गर्मी आने से पहले सूखाग्रस्त घोषित हो चुके हैं। जनवरी 2017 में ही तमिलनाडु में 140 साल का सबसे बड़ा सूखा पड़ा है। पिछले 5 सालों में यहां नहीं के बराबर बारिश हुई है, जिससे लगभग 39,000 एकड़ ज़मीन बेकार हो चुकी है। इससे किसानों पर क़र्ज़ का बोझ लगातार बढ़ता चला गया। क़र्ज़, कंगाली और खेती से जुड़ी दिक्कतों से इनकी हालत बहुत ही दयनीय हो चुकी है। आंदोलन कर रहे किसान केन्द्र सरकार से 40,000 करोड़ रूपये के क़र्ज़ माफ़ करने की मांग कर रहे हैं, क्योंकि बैंक का दबाव लगातार किसानों को परेशान कर रहा है। पिछले साल भी तमिलनाडु में 400 से अधिक किसानों ने आत्महत्या की थी। एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2011-15 तक में 2,728 किसानों ने तमिलनाडु में आत्महत्या की है। प्रदर्शन कर रहे एक 50 वर्षीय किसान के अनुसार, “ये गन्ने और धान की खेती करते थे। उन्होंने 2007 में ट्रैक्टर खरीदने और कुएं की खुदाई के लिए बैंक से 6 लाख का क़र्ज़ लिया था। इसके 3 लाख उन्होंने 2010 में बैंक को चुका दिए थे, लेकिन 2010 के बाद बारिश नहीं होने से अब तक उन पर 16 लाख रूपये की क़र्ज़ राशि हो चुकी है। बैंक की गालियों और यातनाओं से पूरा परिवार सदमे में जी रहा है। बैंक की धमकी मिलती है कि अगर पैसे जमा नहीं किए गए, तो वो उनकी ज़मीन को हड़प लेंगे।“
मांग—
अभी किसानों की प्राथमिक मांग 40,000 करोड़ रूपये की क़र्ज़ माफी का है। इसके अलावा किसानों ने केन्द्र सरकार से ‘कावेरी वाटर प्रबंधन बोर्ड’ के गठन की मांग की है। साथ ही उनका कहना है कि कावेरी रेगुलेटरी कमेटी भी बननी चाहिए, ताकि आने वाले समय में किसानों को दिक़्कतें न उठानी पड़े। बारिश नहीं होने के कारण किसान लगातार कर्नाटक से पानी की मांग करते आए हैं, लेकिन कर्नाटक ख़ुद पानी की समस्या से जूझ रहा है। इसलिए यह विवाद भी गहराता जा रहा है।


प्रदर्शनकारी क्या कहते हैं?
किसानों के इस आंदोलन को समर्थन करने तमिलनाडु से आए इंजीनियर श्रवण के. वासुदेवन कहते हैं- ‘मैं प्रधानमंत्री जी से अपील करता हूं कि उन्हें देश के सभी लोगों के साथ एक समान व्यवहार करना चाहिए। यूपी चुनाव के दौरान क़र्ज़ माफ़ी की घोषणा घूस से ज़्यादा कुछ नहीं है। यह सिर्फ़ अपने स्वार्थ के लिए किया गया, उन्होंने वोट के लिए पैसे दिए, यह सही रास्ता नहीं है। आज सड़क पर आ चुके किसानों को बचाने की ज़रूरत है, ये सभी वरिष्ठ नागरिक हैं। कम से कम प्रधानमंत्री जी को मानवता दिखानी चाहिए, उनके पास इतनी मानवता होनी चाहिए कि वे सभी के साथ समानता की बात करें। आईटी बिल्डिंग्स बहुत ज़रूरी है, लोगों की ज़िन्दगी चलने के लिए भोजन कहीं ज़्यादा ज़रूरी है। देश में भोजन की आपूर्ति के लिए सिर्फ़ किसान हैं, जिसे बचाने की ज़रूरत है। इसलिए हमें बचाएं, भारत को बचाएं। बिना किसान के ये देश तहस- नहस हो जाएगा।’
किसानों के आंदोलन का समर्थन करने तमिलनाडु से आई एक युवती मल्लिका कहती है- ‘5 सालों से पड़े सूखे से खेतीबारी नहीं कर पाने से इन किसानों पर क़र्ज़ का बोझ बढ़ता चला गया। बहुत किसानों ने अपने गहने और ज़मीन तक बेच दिए। पिछले साल 400 से अधिक किसानों ने आत्महत्या की, लेकिन सरकार के द्वारा हमेशा आंकड़ों को दबाने की कोशिश की जाती है। आखिर हम रीढ़ की हड्डी कहे जाने वाले किसानों को क्यों छोड़ते जा रहे हैं? इन सभी किसानों पर मात्र 50,000- 1,00,000 रूपये तक की क़र्ज़ है और इसके लिए उन्हें आत्महत्या करना पड़ रहा है, यह देश के लिए शर्मनाक है। तमिलनाडु में भी युवा काफ़ी संख्या में प्रदर्शन कर रहे हैं, लेकिन उन्हें गिरफ़्तार कर लिया जा रहा है।’

ज़रूरत—
किसानों के तत्काल राहत के लिए फ़िलहाल सरकार को इनके क़र्ज़ माफ़ करने की ज़रूरत है। कावेरी का पानी नहीं मिलना इन किसानों के लिए सिरदर्द बना हुआ है। इसके लिए सरकार को जल्द कावेरी वाटर प्रबंधन कमेटी का गठन करना होगा। इसके अलावा किसान जो भी उत्पादन करते हैं, उसकी भी सही क़ीमत उन्हें नहीं मिल पाती है। किसानों की फसल की खरीद के लिए एमएसपी के सरकारी दर को किसानों के हित में करना होगा, जिससे इनकी स्थति बेहतर हो सके। इसके लिए सरकार को राष्ट्रीय कृषि नीति को बनाने की ज़रूरत है, जिससे सभी राज्यों के हालात बेहतर होंगे। इसके अलावा राज्य में सरकार की फ़सल बीमा योजना जैसी नीतियों को कारगर तरीके से लागू करने की ज़रूरत है।

देश की स्थिति-- 
एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 1995 से अब तक भारत में क़रीब 3 लाख से ज़्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं और स्थिति लगातार बदतर होती जा रही है। देश की जीडीपी में खेती का योगदान तक़रीबन 14 फ़ीसदी तक है, यानि अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा इस पर निर्भर है। इसके बावजूद किसानों के लिए कारगर नीति के अभाव के कारण देश भर के किसानों के ऊपर लगभग 12.60 लाख करोड़ रूपये का क़र्ज़ हो चुका है। एक हक़ीकत यह भी है कि किसानों से ज़्यादा रियायतें बड़े उद्योगपतियों को मिल रही है। राजनीतिक पार्टियों के लिए किसानों की समस्या चुनावी फसल के रुप में एक पका हुआ मुद्दा है। चुनावी वादे के अनुरूप उत्तरप्रदेश सरकार ने भले ही किसानों के 36,000 करोड़ रूपये से अधिक का क़र्ज़ माफ़ कर दिया है, लेकिन किसानों के बदतर हालात का यह स्थायी समाधान नहीं हो सकता है। सरकार को राष्ट्रीय स्तर पर टीम गठित कर प्लानिंग करने की ज़रूरत है। महाराष्ट्र से लेकर कर्नाटक, तेलंगाना, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ राज्यों में भी किसानों की आत्महत्या की एक जैसी स्थिति है। चुनाव आते ही किसानों के हितैषी बन जाने वाली राजनीतिक पार्टियों क्या वाकई कोई दूरगामी नीतियां बना पाएगी? क्या सरकार देश भर के किसानों के हालात देख कर भयभीत नहीं होती? क्या राजनेताओं की संवेदनहीनता ख़त्म हो चुकी है? अगर किसानों का मसला सिर्फ़ राजनीति में उलझता रहा, तो वाकई हम भारतीय असुरक्षित हैं।

प्रदर्शनकारी किसानों का कहना है कि जब तक सरकार समाधान नहीं करती है, वे यहीं बैठेंगे, क्योंकि उनके पास अब जीने का कोई विकल्प नहीं बचा है। जंतर- मंतर का इतिहास इन किसानों के हौसले को बढ़ाकर रखता है, वहीं मौजूदा राजनीति इन्हें डराता भी है। संसद की राजनीति ने इन किसानों को संशय में डाल दिया है। क्या केन्द्र सरकार इनकी सुध ले पाएगी?

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