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ये आकाशवाणी है...

इस आवाज़ के साथ शायद आपकी भी ज़िन्दगी का कुछ हिस्सा गुजरा हो। घर में कल पुराने दोस्त से मुलाक़ात हुई, तो सबसे पहले यही याद आया। काफ़ी समय तक इसने मेरा साथ दिया था। दादाजी(बाबा) होते तो इसका पूरा इतिहास अच्छे से बता देते। अनुमान लगा रहा हूँ कि ये 30 साल से भी ज़्यादा पुराना है। क्योंकि मैं बचपन से इसके साथ हूँ। दादी बता रही है कि बाबा ने उस समय इसे 600 रूपए में ख़रीदा था। इससे ज़्यादा उनको भी कुछ याद नहीं है। अब तो ये ख़राब हो चुका है, बच्चों ने इसके कुछ पार्ट्स निकाल खेल भी कर लिए। मम्मी कल शायद इसे कबाड़ में बेचने वाली थी, लेकिन मैंने बोला कि इसे अपने साथ रखना चाहिए। तो मम्मी हँस पड़ी। अरे भई, लोग यही सब देखने तो म्यूज़ियम जाते हैं। इसलिए मैंने भी सोच लिया है कि घर में पुराने सामानों की एक आर्काइव बना लेनी चाहिए। होनी भी चाहिए, इतिहास बन रहे चीज़ों को अपने- अपने स्तर पर संजोया जाना ज़रूरी है।


इसी पर कमेंट्री सुनते- सुनते कभी सचिन जैसा बनने का ख़्वाब भी आ जाया करता था। क्रिकेट मैच सुनने में पापा का अच्छा साथ मिलता था। 2007 के क्रिकेट वर्ल्ड कप में श्रीलंका के साथ लीग मैच में 2 बजे रात तक इसका वॉल्यूम कम- ज़्यादा करता रह गया था। इसी पर करतार कोचिंग पटना का क्विज़ शो सुनते हुए, 8वीं क्लास में क्विज़ खेलने पटना भी पहुँच गया था। वीरेन्द्र ने इसमें काफ़ी साथ दिया था। फिर अगले हफ़्ते घर में बैठ कर इसी पर सबको पूरा प्रोग्राम सुनाया था। रेडियो के प्रति प्यार और भी गाढ़ा हो गया, जब मैं ख़ुद रेडियो पर आया तो। लोगों को समझ में नहीं आ रहा था कि मैं और वीरेन्द्र कर क्या रहे हैं। रेडियो से प्यार बढ़ रहा था और कुछ नहीं। पटना वाले स्टूडियो में अनाउंसर को देखकर लगता कि शायद माइक पकड़कर मैं ही प्रोग्राम होस्ट कर लूँ।

बाबा और पापा के रोज़ सुबह और रात में समाचार सुनने की आदत के साथ मैं भी जुड़ता चला गया। रात 8:45 बजे से पढ़ाई छोड़ इसी रेडियो को सुनने के लिए चला जाता। रेडियो अनाउंसर के जैसे ही कभी- कभी मैं भी आवाज़ निकालने की नाटक/प्रैक्टिस किया करता था। धीरे- धीरे इसी आदत ने मीडिया के प्रति लगाव भी बढ़ा दिया था। दसवीं से ही कुछ हेडलाइन्स लिखकर मोबाइल पर रिकॉर्ड कर अपनी आवाज़ चेक किया करता था। घर में टीवी आने के बाद समाचारों के साथ ज़्यादा जुड़ाव हो गया था। आज तमाम कोशिशों के बाद भी रेडियो हमारे बीच से ग़ायब ही हो रहा है। चुंकि उसकी तुलना में कम्युनिकेशन के काफ़ी सारे स्ट्रांग मीडियम मौजूद हैं। इसलिए आप और हम इसके अप्रासंगिक होने को नकार भी नहीं सकते।

लेकिन भला इस रेडियो को अपने से दूर कौन जाने देगा, जिसने आपको जीवन जीने की एक कला सिखाई हो? जब तक घर में था, रेडियो को कैसे भी पापा से बोलकर ठीक करवा ही लिया करता। लेकिन फिर टीवी के आने से धीरे- धीरे सबकी रूचि भी ख़त्म हो गई। आपने या आपके ऊपर के जेनरेशन वाले ने तो रेडियो से ज़रूर प्यार किया होगा। मैं इस रेडियो को संभाल कर रख रहा हूँ, आने वाली पीढ़ियों के लिए अजूबा ही सही।



आप भी रेडियो के साथ अपने अनुभव को कमेंट बॉक्स में साझा करें।

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