पिछले कई दशकों से भारत में धर्म और धार्मिक पाखंड के ख़िलाफ़ जागरूकता बड़े स्तर पर नहीं चलाई गई है या इसके ख़िलाफ़ लड़ाई नहीं लड़ी गई है। कम से कम आज़ादी के बाद तो बिल्कुल भी नहीं। कई छोटे- छोटे प्रयास हुए, लेकिन वे कारगर साबित नहीं हुए। तो ऐसे वक़्त में जब धार्मिक राजनीति देश के ऊपर सर से बह रही है, ज़रूरत है कि हम नास्तिकता के प्रचार- प्रसार को बढ़ावा दें और तर्कपूर्ण तरीके से लोगों के अंदर वैज्ञानिक सोच को विकसित कर पाएं। क्योंकि नास्तिकता ही समाज और मानव के संपूर्ण विकास में अंततः सहायक साबित होगा।
पूरी दुनिया में क़रीब 80- 85 करोड़ लोग नास्तिक हैं, जिनमें ज़्यादातर एशिया के बाहर के देश हैं। यूरोप के सबसे विकसित देशों में 80 प्रतिशत तक नास्तिक लोग रहते हैं। वहां धार्मिक प्रभाव मानवीय विकास में गतिरोध नहीं बनते हैं। जबकि भारत की आबादी का बहुत कम या न के बराबर नास्तिकता को मानता है(0.50% के आसपास)। हमारी सामाजिक संरचना को ही इस तरीके गढ़ दिया गया है कि हम उसे तोड़ नहीं पाते। अंबेडकर और भगत सिंह को पढ़ तो लेते हैं, लेकिन वे क्या बताना चाहे, उसे जीवन में उतारने को तैयार नहीं हैं। मानसिक ग़ुलामी से बाहर आना मौजूदा दौर की सबसे बड़ी ज़रूरत बनती जा रही है।
ऐसे समय में जब हम हर महीने इसरो के द्वारा अंतरिक्ष में पहुंच जाते हैं, तो देश के लोगों में धार्मिक चीज़ों को छोड़ वैज्ञानिक तार्किकता का बड़े स्तर पर विकास होना चाहिए था। लेकिन राजनीतिक प्रभुत्व के कारण ऐसा हुआ नहीं। राहुल सांकृत्यायन, अंबेडकर, भगत सिंह, पेरियार जैसे महान नास्तिक विद्वानों की प्रासंगिकता भारत के बड़े हिस्से से ग़ायब है। इन लोगों ने ईश्वर को सिरे से ख़ारिज कर समाज को आगे बढ़ाने का बेजोड़ काम किया है, उनकी रचनाओं और बातों को आम लोगों के बीच लाना बेहद ज़रूरी है। मौजूदा दौर के तर्कशील विचारक- जैसे यशपाल, गोविंद पाणसरे, एम एम कलबुर्गी, नरेंद्र दाभोलकर, कांचा इलैया की रचनाएं बहुत कम लोगों तक पहुंच रखती है।
आज भारत में जो लोग नास्तिक हैं, वे भी धार्मिक कुरीतियों के ख़िलाफ़ सही और तार्किक लड़ाई लड़ने के बदले अहंकार भाव में जी रहे हैं। हमें ज़रूरत है कि ख़ुद के बलबूते पर संगठन बनाकर या व्यक्तिगत स्तर पर प्रयास करने की, जिससे लोगों में आसानी से वैज्ञानिक सोच की वृद्धि हो। क्योंकि ये काम हमारी सरकारें कभी नहीं कर सकती।
राजनीतिक सत्ता के मकड़जाल से बाहर निकालने के लिए लोगों को धार्मिक चीज़ों के ख़िलाफ़ खड़ा करना ही होगा। लोगों को नास्तिकता की तरफ़ मोड़ना या उनके सामने बातें करना झटके जैसा हो सकता है, क्योंकि उस वक़्त वे एक बड़े सामाजिक बंधन को तोड़ने के लिए बाध्य होंगे, जो झूठ पर आधारित रहा है। लेकिन उन्हें वैज्ञानिक आधार पर सच का सामना कराना होगा।
इसलिए लोगों को भारतीय सामाजिक व्यवस्था के दुष्परिणाम के कारणों को समझाना होगा। लोगों के अंदर विश्वस्तरीय उदाहरणों को भरना होगा। और इतिहास की बिगड़ती शक्ल की सच्चाईयों को किताबों और विचारों के माध्यम से बताना होगा। इसके लिए कथित धर्मनिरपेक्ष चादर ओढ़ना समाधान नहीं है। नास्तिक दोस्तों से आग्रह है कि लड़ाई शुरु कर दें। यही सबसे अच्छा समय है, जब धर्म की राजनीति समाज में हावी है।
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