आप/तुम क्या हैं/हो?
बस इतना ही समझ लीजिए कि आप कुछ भी नहीं हैं। जब आपके जीवन जीने के अधिकतर सोच दूसरों के दिए हुए हों, तो आपकी अपनी व्यक्तित्व ही डुप्लीकेट है। आप अपने परिवार, समाज के द्वारा फ़ैलाए गए चादर में ढके हुए एक व्यक्ति हैं और आप कहते हैं कि आप 'आप' हैं। जब तक आप उस चादर को हटाकर ख़ुद से साक्षात्कार नहीं करते, मैं नहीं समझूंगा कि ये आप हैं।
आप अपनी विशिष्टता दूसरों को ख़ुश या दुखी करने में दिखाते हैं, न कि तार्किक होने में। आपको बताया गया है कि एक भगवान है, आपने मान लिया। बताया गया कि चार हैं, आपने वो भी मान लिया। आप कभी भी अपने हिंदू, मुस्लिम, जाति विशेष होने पर परिवार या समाज पर सवाल नहीं उठाते। उस पर बिना प्रश्न चिह्न खड़े किए उसको पोषते हैं।
जो इन चीज़ों को ग़लत भी समझते हैं (या नहीं मानते), इसके बावजूद मुर्दाशांति से भर कर पूरा जीवन जी लेते हैं। क्योंकि उन्हें इतने बड़े सामाजिक व्यवस्था के ख़िलाफ़ जाने में घबराहट होती है। वे अपना खाल नहीं उतारना चाहते हैं।
मैं तुम्हारे धार्मिक भावनाओं पर ठेस पहुंचाने आया हूँ, क्योंकि जब तक ठेस नहीं पहुंचेगा कुछ नया नहीं होगा। मैं दिमागी ग़ुलामी को ख़त्म करने आया हूं, क्योंकि ज़िन्दगी जीने का पहला शर्त वही है और तुम हो कि झूठी चीज़ों पर ख़ुश हुए जा रहे हो। बात यह है कि तुम्हारा 'व्यक्तित्व' तुमसे है, न कि परिवार के दिए हिंदू- मुस्लिम वाले चादर से।
पैदा होने वक़्त तुम्हें नहीं मालूम था कि हिंदू हो या मुसलमान। सोचो अगर तुम्हारे परिवार ने तुम्हें मुस्लिम बनाया होता या कुछ और तो आप क्या होते। क्या इसके बाद भी इस चीज़ का दंभ भरते। सोचो अगर तुम्हारे कोई नास्तिक मां-बाप तुम्हें बचपन से नास्तिक बना देते, तब भी तुम भगवान/अल्लाह का ज़िक्र करते।
आए हो तो इस बने बनाए खाल को हटाकर जाओ। धर्म के पोषकों का एक और मुखौटा बन कर ख़त्म मत हो जाना। क्योंकि सबसे ख़तरनाक होता है आत्मसाक्षात्कार न कर पाना।
बस इतना ही समझ लीजिए कि आप कुछ भी नहीं हैं। जब आपके जीवन जीने के अधिकतर सोच दूसरों के दिए हुए हों, तो आपकी अपनी व्यक्तित्व ही डुप्लीकेट है। आप अपने परिवार, समाज के द्वारा फ़ैलाए गए चादर में ढके हुए एक व्यक्ति हैं और आप कहते हैं कि आप 'आप' हैं। जब तक आप उस चादर को हटाकर ख़ुद से साक्षात्कार नहीं करते, मैं नहीं समझूंगा कि ये आप हैं।
आप अपनी विशिष्टता दूसरों को ख़ुश या दुखी करने में दिखाते हैं, न कि तार्किक होने में। आपको बताया गया है कि एक भगवान है, आपने मान लिया। बताया गया कि चार हैं, आपने वो भी मान लिया। आप कभी भी अपने हिंदू, मुस्लिम, जाति विशेष होने पर परिवार या समाज पर सवाल नहीं उठाते। उस पर बिना प्रश्न चिह्न खड़े किए उसको पोषते हैं।
जो इन चीज़ों को ग़लत भी समझते हैं (या नहीं मानते), इसके बावजूद मुर्दाशांति से भर कर पूरा जीवन जी लेते हैं। क्योंकि उन्हें इतने बड़े सामाजिक व्यवस्था के ख़िलाफ़ जाने में घबराहट होती है। वे अपना खाल नहीं उतारना चाहते हैं।
मैं तुम्हारे धार्मिक भावनाओं पर ठेस पहुंचाने आया हूँ, क्योंकि जब तक ठेस नहीं पहुंचेगा कुछ नया नहीं होगा। मैं दिमागी ग़ुलामी को ख़त्म करने आया हूं, क्योंकि ज़िन्दगी जीने का पहला शर्त वही है और तुम हो कि झूठी चीज़ों पर ख़ुश हुए जा रहे हो। बात यह है कि तुम्हारा 'व्यक्तित्व' तुमसे है, न कि परिवार के दिए हिंदू- मुस्लिम वाले चादर से।
पैदा होने वक़्त तुम्हें नहीं मालूम था कि हिंदू हो या मुसलमान। सोचो अगर तुम्हारे परिवार ने तुम्हें मुस्लिम बनाया होता या कुछ और तो आप क्या होते। क्या इसके बाद भी इस चीज़ का दंभ भरते। सोचो अगर तुम्हारे कोई नास्तिक मां-बाप तुम्हें बचपन से नास्तिक बना देते, तब भी तुम भगवान/अल्लाह का ज़िक्र करते।
आए हो तो इस बने बनाए खाल को हटाकर जाओ। धर्म के पोषकों का एक और मुखौटा बन कर ख़त्म मत हो जाना। क्योंकि सबसे ख़तरनाक होता है आत्मसाक्षात्कार न कर पाना।
sahi hai...
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