जब भी मैं धर्म और पाखंड पर बात करता हूं, तो लोग मुझे नास्तिक बोलकर छुटकारा पाने की कोशिश करते हैं। लेकिन वो ख़ुद पाखंड को कुरीति मानकर भी छुटकारा पाने के बदले उसे ढोते रहते हैं। नास्तिकता का डिबेट कोई नया नहीं है। अगर आप अपने भगवान, अल्लाह या किसी ऐसी काल्पनिक शक्ति के बारे में एक तर्क देंगे, तो मैं अपने विचार पर दोबारा सोचने की कोशिश ज़रूर करूंगा।
धर्म के ख़िलाफ़ बोलने पर धार्मिक व्यक्ति को बुरा लगना स्वभाविक है। क्योंकि उसकी पूरी जीवनशैली उससे जुड़ी होती है। भगवान को ना मानने वाले लोग धर्म को चुनौती देते हैं, उसकी खामियों को सामने रखते हैं। हज़ारों सालों से जो चीज़ हम पर थोपा गया है, उससे बाहर निकलने की कोशिश करते हैं और इसमें कोई बुराई नहीं है।
समाज बहुत सारी चीज़ों को तोड़कर बाहर आया है, जिसको लोग धर्म के हिसाब से अपनी संस्कृति और सभ्यता मानते थे। सती प्रथा हो, समलैंगिकता हो, तीन तलाक हो, व्यभिचार हो, महिलाओं का खतना हो या उन्हें घर तक सीमित रखना हो, ये सब समय के साथ बदले हैं। लेकिन इनका जड़ कहां था, धर्म में ही ना। इन सबको जस्टिफाई करने के लिए हमेशा धर्म और ईश्वरीय क़ानून का हवाला दिया जाता रहा है, लेकिन ख़त्म हुआ कि नहीं।
पैदा होने वक़्त बच्चे को मालूम नहीं होता कि वह हिंदू है या मुसलमान या ईसाई या कुछ और। मनुष्य का पैदा होना एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। जब तक एक स्त्री और पुरूष सेक्स नहीं करेंगे (अब दूसरे वैज्ञानिक पद्धति भी) तो बच्चा नहीं पैदा होगा। सोचिए अगर आपके परिवार ने आपको मुस्लिम या हिंदू बनाया होता या कुछ और तो आप क्या होते। अगर आपके कोई नास्तिक मां-बाप आपको बचपन से नास्तिक बना देते, तब भी आप भगवान/अल्लाह का ज़िक्र करते।
मां-बाप से या परिवार में आप रूढ़िवादी चीज़ों के ख़िलाफ़ लड़ते हैं कि नहीं लड़ते हैं? अगर वो उसी तरीके से चलता रहे तो क्या ग़लत है, उसको भी मानकर बैठ जाना चाहिए। धर्म की बुनियाद ही पूरी तरीके से झूठ पर है, इसलिए इस झूठ के ख़िलाफ़ बोलने से मुझे डर नहीं लगता है।
हमें बताया गया कि एक भगवान है, हमने मान लिया। बताया गया कि चार हैं, वो भी मान लिए। हम कभी भी अपने हिंदू, मुस्लिम, जाति या धर्म विशेष होने को लेकर परिवार या समाज पर सवाल नहीं उठाते हैं। उस पर बिना प्रश्न चिह्न खड़े किए उसको पोषते रहते हैं।
अपने आसपास हर एक छोटी से छोटी चीज़ को देखिए और पता कीजिए कि उसमें भगवान या धर्म का कितना रोल है? या फिर उसमें विज्ञान का कितना रोल है। अपने पैदा होने से लेकर अपनी मृत्यु तक 'भगवान' जैसी किसी चीज़ का क्या रोल है? बात दिमाग़ पर ज़ोर देने की है।
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