आप कभी ऐसी यात्रा/सफ़र पर गए हैं, जहां से आपको लौटने का मन नहीं करता हो। यशपाल का यह कालजयी उपन्यास 'झूठा सच' ऐसी ही किसी यात्रा पर लेकर चला जाता है। विभाजन की त्रासदी पर तत्कालीन समाज, वर्ग भेद और राजनीतिक-सांस्कृतिक घटनाओं को इतनी बारीकी से समेटकर बताना वाकई अद्भुत है। 960 से ज़्यादा पन्नों के इस उपन्यास में भी नारीवादी विचार, वर्ग संघर्ष, वैवाहिक जीवन, प्रेम, राजनीति, सामाजिक जड़ता, इन्हीं विषयों के आसपास कहानी चलती रहती है।
विभाजन और उसके बाद की परिस्थितियों पर हम जो कुछ भी एकेडमिक किताबों में पढ़ते हैं, उसमें राजनीतिक चर्चाएं ज़्यादा होती हैं। राजनीतिक इतिहास में समाज का भीतरी सच छूट जाता है। इसलिए सामाजिक और सांस्कृतिक पहलुओं को समझने के लिए साहित्यकारों और पत्रकारों के बीच से गुजरना होता है। यशपाल ने इस उपन्यास में ऐसे ही तीन-चार मुख्य किरदारों को केंद्र में रखकर पहले सांप्रदायिक तनावों, आर्थिक-सामाजिक परिदृश्यों और फिर लाहौर से आए शरणार्थियों की समस्याओं, महिलाओं के साथ यौनिक हिंसा और बदलती राजनीति को हूबहू रख देते हैं।
उपन्यास में जयदेव और तारा मुख्य किरदार हैं। अपने आदर्शों के कारण अख़बार के संपादक को झाड़ लगाकर नौकरी छोड़ने वाला 'प्रगतिशील' जयदेव, अपनी बहन तारा के एक मुसलमान लड़के से प्रेम करने पर खिन्न हो जाता है। जब तारा की अरेंज शादी उसके ना चाहने पर भी होती है, तो जयदेव अपनी मौन सहमति देता है। जयदेव ख़ुद भी एक लड़की से प्यार करता है। लेकिन बहन को कई मसलों पर साथ देने के बावजूद वो उसे 'स्त्री' के रूप में भी ज़रूर देखता है। ये एक छोटा सा प्रसंग है। पूरे उपन्यास में मेरे लिए तारा और कनक (जयदेव की प्रेमिका) का किरदार सबसे ज़बरदस्त है।
पहले भी कभी लिखा था कि यशपाल की लेखनी यथार्थ का एक बारीक रूप है। अपनी हर कहानियों में इन्होंने कथित सामाजिक आदर्शों और संस्कारों को उघाड़ते हुए स्त्री-पुरूष संबंधों के प्राकृतिक रूप को उकेरा है। कहानी का विषय जो भी हो, उसमें संबंधों को लेकर बनी जाल को ज़रूर खरोचा जाता है। इनकी लिखावट की ख़ासियत राजनीतिक परिस्थितियों को समकालीन संस्कृतियों से जोड़कर बहस पैदा करना है। और उसी बहस में आपके अंदर एक ज़बरदस्त द्वंद्व पैदा होता रहता है।
जितनी चर्चा यशपाल के समकालीन साहित्यकारों की होती है या सुनता हूं, उतनी उनकी नहीं होती। इसके पीछे की वजह मुझे नहीं पता है। लेकिन मेरे लिए यशपाल को पढ़ना यानी ख़ुद से ढेरों सवाल-जवाब करने जैसा है। विचारों की व्यवहारिकता को आंखों के सामने लाना है। यशपाल की किताबें ज़िंदगी का अहम हिस्सा हो चुकी हैं। व्यवहारिक जीवन की कई विषयों पर विचारों को दुरुस्त करना सिखाया है।
कहानी में हर पात्र को एक उचित जगह देकर वे पाठकों के लिए असीम कल्पनाओं का द्वार खोलते हैं। यह तय है कि आप इस किताब को पढ़ते हुए उपन्यास के किसी एक किरदार के रूप में ख़ुद को ज़रूर ढाल लेंगे। वैचारिक संघर्षों और नैतिक द्वंद्वों से बुने हुए इस उपन्यास को मैं यशपाल की बेहतरीन रचनाओं में गिनता हूं। यशपाल आपको तर्क की कसौटी पर खड़ा होना सिखाते हैं।
कुल मिलाकर एक ऐसा लेखक, जो अपने हर शब्दों से समाज के साथ बगावत करता हुआ नज़र आता है। उनकी अधिकतर रचनाएं आज़ादी के समय की सामाजिक और राजनीतिक विषयों को छूती हैं। उनकी रचनाओं को पढ़ते हुए एक सवाल ज़रूर आता है, कि उन्होंने अपनी लेखनी में कहीं डॉ अंबेडकर का ज़िक्र क्यों नहीं किया। किसी को अगर पता हो तो बताएं। मैं अपने स्तर पर छानबीन करने की कोशिश कर रहा हूं। क्योंकि उनके उपन्यासों में नेहरू, गांधी, जिन्ना और सभी महत्वपूर्ण राजनेताओं की किसी ना किसी तरह चर्चा है। आज अगर यशपाल होते तो मैं उनसे दोस्ती करने की कोशिश करता।
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