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जेनेरेशन गैप या कम्यूनिकेशन गैप ??

आज से 5-6 दिन पहले मेरे दिल को एक गहरा आघात पहुँचा था, जो अब तक मेरे दिल और दिमाग को घेरे हुए है। इसकी बहुत सारी वजहें बनी; आज के दौर के व्यस्त अभिभावक, तानाशाही शिक्षकों की क्रूरता, हमारी स्कूलिंग सिस्टम, समाज की संकीर्णतावादी सोच आदि। सबसे बड़ी वजह थी कि राँची के एक छठी कक्षा के लड़के ने आत्महत्या कर ली। उसकी उम्र महज 11- 12 साल की थी। अख़बार में छपी ख़बर के अनुसार वह डीएवी पुंदाग का छात्र था और अपने होमवर्क वाले डायरी न मिलने के कारण काफी निराश था। इसी डर के कारण उसने खुदकुशी कर ली। खुदकुशी की जो भी वजहें रही हो लेकिन इस घटना ने समाज में एक भय का माहौल जरूर बना दिया। क्या एक छोटा- सा बच्चा भी इस तरह के फैसले ले सकता है जिससे वो अपनी बहुमूल्य जिंदगी को ही गँवा बैठे? सवाल है कि इन सबके बीच माँ- बाप कहाँ है? इस बच्चे के अभिभावक ने बताया कि वो होमवर्क डायरी न मिलने से काफी डर गया था और रात में इसी डर के साथ वो अपने बिस्तर पर गया, फिर सुबह........।
किसी व्यक्ति ने आत्महत्या का रास्ता क्यों चुना, इस प्रश्न का उत्तर खोज पाना तो कठिन रहा ही है, लेकिन जब एक छोटा- सा बच्चा इस तरह के कदम उठाता है तो कहीं न कहीं यह अभिभावक और बच्चे के बीच की संवादहीनता को दर्शाता है।

हमलोग जेनेरेशन गैप की बातें करते हैं उस पर डिबेट भी करते हैं और अधिकांश युवा इसे आधुनिक पीढ़ी की सोच बता कर सही भी ठहरा देते हैं। लेकिन आज सबसे बड़ा खतरा अभिभावक और बच्चों के बीच के कम्यूनिकेशन गैप का हो गया है। सबसे पहले तो बच्चों के ऊपर स्कूल का दबाव और उसके बाद अभिभावक के आकांक्षाओं के अनुरूप दिया गया पढ़ाई का दबाव। बच्चे दबाव के कारण अपने अभिभावक को आधी बातें ही बताते हैं या फिर छिपाते चलते हैं। माँ- बाप भी अपनी व्यस्तता में बच्चों के साथ ठीक से संवाद स्थापित नहीं कर पा रहे हैं। अधिकांश बच्चों के पिता तो गुड माॅर्निंग और गुड नाइट तक ही बच्चों के साथ सीमित रह गए हैं। उनकी अपनी आकांक्षाओं और सपनों पर सभी बच्चे का मन और दिमाग फिट नहीं बैठ सकता। यहीं पर दरकार होती है पारदर्शी संवाद की जिससे बच्चों पर आने वाले निरर्थक दबाव को कम किया जा सकता है, क्योंकि हर बच्चा एक जैसा और सामान्य प्रवृत्ति का नहीं होता है।

अपने देश में हर साल एक लाख से ज्यादा लोग आत्महत्या करते हैं जिसमें युवा वर्ग की संख्या सबसे ज्यादा रहती है। अब किशोरों की संख्या भी बढ़ने लगी है। एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2013 में भारत में आत्महत्या करने वालों में 60 हजार  से ज्यादा लोग 10- 24 साल के थे। साल 2014 और 2015 की भी लगभग यही स्थिति रही और इसका सबसे बड़ा कारण संवादहीनता ही है। माँ- बाप बच्चों के साथ बातचीत कम करते हैं, उन पर दबाव ज्यादा बनाते हैं। दूसरों के बच्चों का उदाहरण उन पर थोपने का पुराना रिवाज़ है। इन सबसे बच्चों की रचनात्मकता तो क्षीण होती ही है, साथ ही साथ वे मनोविकार जैसी स्थिति में भी पहुँच जाते हैं।

इन सबके बीच जरूरत है कि अभिभावक बच्चों के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताएँ, उनके कार्यों में पारस्परिक सहयोग करें, उनकी कमियों को पहचान कर उन्हें मोटिवेट करने की कोशिश करें तथा बच्चों के साथ कम्यूनिकेशन को कम न होने दें। उनके साथ रिलेशन्स में पारदर्शिता लाएँ तथा उन्हें खुद के करियर को चुनने और आगे बढ़ने में मदद करें, न कि उन पर अपनी आकांक्षाओं के करियर को थोपें। उनकी हर समस्या को सुनें, समझें तथा बच्चों के साथ मिलकर ही उसका समाधान निकालें। होम ट्यूटर लगाकर और अपनी जिम्मेदारियों से मुक्ति पाकर बच्चों को
पढ़ाई में तेज बनाने से ज्यादा जरूरी आज उन्हें मानसिक रूप से तेज बनाना है। ताकि वो खुलकर अपने अभिभावकों के साथ बातचीत कर सकें। जो कुछ भी हम बच्चों को सिखाते और समझाते हैं, बड़े अगर खुद उन पर अमल करें तो यह संसार ही स्वर्ग बन जाए। इस बच्चे की आत्महत्या की घटना हमारे देश, समाज और अभिभावकों को उनके सजगता के प्रति ख़बरदार करती है।
हे मेरे भारतीय अभिभावक! अब तो सजग हो जाएँ।

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