नफ़रत का कारोबार अब टीवी चैनलों की ज़रूरत बन चुका है। ऐसा लगता है कि इसके बिना अब ये धंधा नहीं चल सकता है। क़रीब 8-9 पहले मैंने लिखा था कि एजेंडा सेटिंग थ्योरी किस तरीके से दर्शकों पर हावी है। उस वक़्त भी मैंने आज तक के कार्यक्रम 'दंगल' का एक महीने का विश्लेषण किया था। उसमें हर दो-तीन दिन में राम मंदिर पर बहस किया गया था। अब ज़रा आज तक, ज़ी न्यूज़ और एबीपी न्यूज़ की शाम के वक़्त बहसों का मुद्दा देखिए। हर दिन हिंदू, राम, कश्मीर, पाकिस्तान, मुसलमान, इमरान खान के आस पास ये एंकर भटकते रहते हैं। कुछ ख़ास और अधूरे तथ्यों को लेकर उसे तोड़ना-मरोड़ना लगा ही रहता है।
सांप्रदायिकता फ़ैलाने के लिए तैयार माल बिना रुके बेचा जा रहा है। तीनों चैनलों की ये सभी तस्वीरें जुलाई महीने की हैं। सिर्फ़ इस 3 हफ़्ते में इन चटकदार विषयों पर इतनी बार बहस की गई है। अगर आप हर महीने का विश्लेषण करेंगे तो कमोबेश इन चैनलों पर यही स्थिति रहती है। इसी जुलाई महीने में पूरा देश अलग-अलग आपदाओं से जूझता रहा है लेकिन इनके लिए वो आम घटना रही। इसका नतीजा मैं यही निकाल पाता हूं कि अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ एजेंडा चलाकर ये लोग जनता के बीच गोलवलकर और गोडसे जैसी चेतना का विकास जोरदार तरीके से कर रहे हैं। बेशक इसका सबसे ज़्यादा फ़ायदा सत्तारूढ़ पार्टी को हो रहा है।
आपने देखा होगा कि फरवरी-मार्च में किस तरीके से इन्हीं लोगों ने स्टूडियो से ही भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध का शानदार प्लॉट तैयार कर दिया था। स्टूडियो के ग्राफिक्स से सिर्फ़ आग, गोला और रॉकेट ही फेंके जा रहे थे। चुनाव भी बेहद नज़दीक था। सबकुछ इतना बढ़िया हुआ कि 23 मई को इनके चेहरे पर ग़ज़ब की चमक थी। वैसे इनके राष्ट्रवादी एजेंडे में सवाल कहीं भी नहीं है, सिर्फ़ उन्माद है। अगर सवाल होता तो इसी एजेंडे में सरकार से एक बार पूछने की जुर्रत करते कि पुलवामा हमले की एनआईए जांच का क्या हुआ?
देश के अंदर कहीं भी और किसी भी तरह की घटना होती है, तो टीवी चैनलों के लिए उसमें संवेदनशीलता कम बल्कि उसका व्यवसायीकरण ज़्यादा दिखता है। पिछले महीने मुज़फ़्फ़रपुर की घटना के बारे में भी मैंने लिखा था कि वो चैनलों के लिए टीआरपी का मसला हो गया। अब जब मुज़फ़्फ़रपुर की वो घटना ख़त्म हो गई, तो फिर आपके स्वास्थ्य के मुद्दों पर पिछले एक महीने में कितनी बार चर्चा की गई?
इन्हीं दिनों में चेन्नई में पानी की भीषण किल्लत पर ये क्यों नहीं बहस कर पाए। मराठवाड़ा और विदर्भ में सुखाड़ की भीषण स्थिति पर चर्चा करने के बदले इन्होंने पाकिस्तान को मुद्दा बनाना ठीक समझा। हिंदू धर्म और राम ही इन समस्याओं का समाधान कर दे, शायद इसलिए इसपर बारंबार बहस हो रही है। वैमनस्यता की भावना ऐसी कि स्वास्थ्य, कृषि, मानवाधिकार, आदिवासी, शिक्षा, विज्ञान, प्रदूषण, सब ग़ायब है। बाढ़ भी इनलोगों के लिए टीआरपी मटीरियल हो जाता है। रिपोर्टर को सीने तक भरे पानी में ठेल देते हैं और चैनल में बैठकर मज़ा लूटते हैं। मैं सोच रहा था कि चैनल वाले इन एंकरों को ग्राफ़िक्स के बदले असल में चंद्रयान से भेज देते तो कितना अच्छा होता। शायद यहां कुछ बच जाता!
अब नफ़रत और वैमनस्य की एक ऐसी दीवार कायम कर दी है कि अगले कई वर्षों तक यह नहीं टूट सकेगा। लोगों को एक बात साफ़ कर दूं कि इन एंकरों को इसी तरह के द्वेष फैलाने के पैसे मिल रहे हैं। मैंने लोकसभा चुनाव से ठीक पहले तक अपनी आंखों से सप्ताह में हर दिन एक ही स्क्रिप्ट और एक ही पैनलिस्टों की सूची को देखा है। वही मौलाना और वही पंडे। लेकिन आप क्यों अपनी बौद्धिकता खो रहे हैं?
क्या आपके भीतर इस नफ़रत के व्यवसाय को बहिष्कार करने की हिम्मत नहीं है? क्या आपको रोज़गार, पानी, शिक्षा, स्वच्छ हवा और मूलभूत सुविधाएं नहीं चाहिए? 100 बच्चों की मौत के बाद पनपा आपका गुस्सा कहां चला जाता है? क्या आप शाम को टीवी ऑन कर देते हैं?
आपलोंगों की सहायता के लिए मैं एक बार फिर प्रसिद्ध अमेरिकी पत्रकार वाल्टर लिपमैन की एजेंडा सेटिंग थ्योरी को लिख देता हूं। पत्रकारिता की पढ़ाई के दौरान कई बार हमारा ध्यान इस पर दिलाया जाता है। लिपमैन ने अपनी पुस्तक "पब्लिक ओपिनियन" में लिखा था- लोग वास्तविक दुनिया की घटनाओं पर नहीं, बल्कि उस मिथ्या छवि के आधार पर प्रतिक्रिया ज़ाहिर करते हैं जो हमारे दिमाग़ में बनाई गई है/जाती है। मीडिया हमारे मस्तिष्क में ऐसी छवि बनाने और एक झूठा परिवेश (माहौल) बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
आपलोंगों की सहायता के लिए मैं एक बार फिर प्रसिद्ध अमेरिकी पत्रकार वाल्टर लिपमैन की एजेंडा सेटिंग थ्योरी को लिख देता हूं। पत्रकारिता की पढ़ाई के दौरान कई बार हमारा ध्यान इस पर दिलाया जाता है। लिपमैन ने अपनी पुस्तक "पब्लिक ओपिनियन" में लिखा था- लोग वास्तविक दुनिया की घटनाओं पर नहीं, बल्कि उस मिथ्या छवि के आधार पर प्रतिक्रिया ज़ाहिर करते हैं जो हमारे दिमाग़ में बनाई गई है/जाती है। मीडिया हमारे मस्तिष्क में ऐसी छवि बनाने और एक झूठा परिवेश (माहौल) बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।













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