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कॉरपोरेट और सरकार की चोरी, जनता से सीनाजोरी

वेदांता वही कंपनी है जिसने ओडिशा में यूनिवर्सिटी खोलने के नाम पर राज्य सरकार के साथ मिलकर चोरी छिपे क़रीब 6000 एकड़ ज़मीन हड़पने की कोशिश की थी। साल 2006 में बीजू जनता दल (बीजद) सरकार ने हर क़ानून को ताक पर रखकर 4000 एकड़ ज़मीन अधिग्रहण कर वेदांता फ़ाउंडेशन को दे भी दी थी। लोगों के कड़े विरोध के बाद उड़ीसा हाई कोर्ट ने ज़मीन अधिग्रहण पर रोक लगा दी थी। मामला अभी भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।

यह ज़मीन पुरी-कोणार्क मरीन ड्राइव (ओडिशा तट) पर है जहां 1.82 मिलियन टन थोरियम युक्त मोनेजाइट का भंडार मिला था। इतनी ज़मीन में क़रीब 18 गांव आते हैं। 2004 और 2009 के चुनावों में वेदांता ने बीजद के लिए भरपूर पैसा लगाया था। इसलिए यूनिवर्सिटी के नाम पर अवैध तरीके से ज़मीन हड़प कर कारोबार को फलने-फूलने दिया जाना था।

पिछले साल अक्टूबर महीने में ही वेदांता की इस प्रस्तावित यूनिवर्सिटी के अध्यक्ष बिजय पटनायक ने इस्तीफा देते हुए कहा था कि यूनिवर्सिटी कोई इंडस्ट्री नहीं है। इसे किराए के मकान में भी शुरू किया जा सकता है।

सही बात है, जेएनयू जैसी बड़ी यूनिवर्सिटी 1000 एकड़ के आस-पास में फैली हुई है। उसमें भी आधा हिस्सा जंगलों से भरा पड़ा है। तो फिर वेदांता को इससे 5-6 गुना ज़मीन क्यों चाहिए?

क्योंकि वेदांता का मक़सद कुछ और ही है। इतने बड़े क्षेत्र को ग़ैरकानूनी रूप से हड़पने का एक ही मक़सद हो सकता है, वो है प्राकृतिक संसाधनों को हथिया कर एक और अपना साम्राज्य खड़ा करना। भारत के तमाम अरबपति और खरबपति अपने कार्य कुशलता की वजह से नहीं बने हैं, बल्कि सब के पीछे राजनीतिक भ्रष्टाचार का नेक्सस का होना है। ज़मीन हथियाना, प्राकृतिक संसाधनों को लूटना अरबपति बन जाने की सबसे बड़ी वजह है।

वेदांता कंपनी के रक्षक-भक्षक सिर्फ़ बीजेपी और कांग्रेस नहीं है। कई राजनीतिक पार्टियां उस पर अपना दुकान चला रही है। तमिलनाडु में 12 लोगों की मौत के बाद भी दोनों पार्टियों के नेता तू-तू, मैं-मैं का खेल खेलकर आपको असल मुद्दे पर नहीं लाएगी। राहुल गांधी इस मुद्दे पर ट्विटर पर पेनाल्टी कॉर्नर मार रहे हैं, सुब्रमण्यम स्वामी हेड लगाकर चिदंबरम पर आरोप लगा रहे हैं। एक कोई मंदिर या पादरी का मुद्दा आने दीजिए फिर ये भी गोल।

कॉपर प्लांट से निकलने वाले धुओं से आपकी जान जाएगी तो क्या हो गया, सरकार मुआवजा देगी न। जी लीजिएगा कुछ दिन। बीमार पड़े तो उसी ग्रुप के किसी अस्पताल में ज़िंदगी भर की कमाई लगा दीजिएगा। बांकि जब तक आपके व्यक्तिगत ज़िंदगी में कुछ बुरा न हो जाय तब तक मौज कीजिए।


किसान ने प्रदर्शन किया तो गोली चलाकर जान ले ली, आम लोगों ने अपनी सेहत को लेकर प्रदर्शन किया तो गोली चलाकर जान ले ली। वोट मांगने फिर आएंगे वो तो क्या तुम कुछ नहीं चलाओगे। क्या मध्य प्रदेश और तमिलनाडु में मारे गए लोग तुम्हारे भाई-बहन नहीं थे।

नोट: इतना समझिए कि कॉरपोरेट और सरकार (राजनीतिक पार्टियों) का नेक्सस ऐसा है कि आपको इससे उबरने के लिए पूरे सिस्टम के ख़िलाफ़ दिन-रात धरने पर बैठना होगा।

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