झारखंड सरकार ने कल 2018-19 के लिए 80,200 करोड़ रुपये का बजट पेश किया, जो कि राज्य की आबादी और अर्थव्यवस्था के हिसाब से काफ़ी और बढ़िया है। यह राशि पिछली बार के बजट से स्पष्टत: ज़्यादा है। पिछले साल रघुबर जी ने 75 हज़ार करोड़ का बजट पेश किया था, जिसका मुश्किल से अब तक 40 फ़ीसदी भी खर्च नहीं हो पाया। रघु कह रहे हैं कि अगले तीन महीने में पूरी राशि ख़र्च हो जाएगी। भईया राज्य की जनता को शॉपिंग थोड़ी करवानी है जो ख़र्च हो जाएगी। बोलिए कि ये आपकी नाकामी है। आप अपनी मशीनरी को बेहतर बनाने में 3 साल बाद भी असफ़ल है। वैसे रघुबर जी भी '2022' तक झारखंड की समस्याएं ख़त्म करने की बात करते रहते हैं।
'आदिवासियों का विकास' जैसे जुमले भी आए हैं। जुमले इसलिए क्योंकि ज़मीन पर काम कीड़ों की तरह सड़ती रहती हैं। पिछले 17 साल से सब दे रहे हैं। सरकार ने हर क्षेत्र में बजट की राशि को कुछ प्रतिशत तक बढ़ाया है। शिक्षा में पिछले साल के मुकाबले 6.31% बढ़ाकर राशि 11,181 करोड़ हो गई। पूरे बजट का लगभग 13% (मोटामोटी) होगा, लेकिन सोचिए कि इतनी बड़ी राशि जाती कहां है। इतना ही समझिए कि बिहार की जो हालत है ठीक वही यहां के सरकारी स्कूलों और प्रणाली की है। मुझे झारखंड में शिक्षा सुधार पर नया कुछ भी सुनने को नहीं मिला है।
रोजगार को लेकर सिर्फ़ हवा बनाया गया है। जो छात्र JPSC और JSSC का फ़ॉर्म भरते हैं उनसे पूछिए क्या हालत है। एक-एक साल तक रोक लगाने के बाद कभी फ़ॉर्म तो कभी एग्जाम ही रद्द हो जाता है। आयोग से लेकर पूरी सरकारी मशीनरी फ़ेल है, लेकिन हवा बनाएंगे पहाड़ पर 200 फ़ीट ऊंचा झंडा फहराकर। बजट के पैसों का कहां उपयोग होता है ये तो मुझे भी नहीं पता।
पिछले एक साल की घटनाओं को देखते हुए स्वास्थ्य के क्षेत्र में 23% की बढ़ोतरी कर बजट को 3,826 करोड़ पहुंचाया गया। अब भी पूरे बजट का 5 फ़ीसदी से भी कम ही है। सरकार स्वास्थ्य की समस्या को गंभीरता से ले ही नहीं पा रही है। नहीं तो आदिवासी और ग़रीबों के विकास के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बनाने पर ज़ोर ज़रूर देती। कुपोषण, एनीमिया जैसी समस्याओं के आंकड़ों को देखने के बाद भी लगातार नज़रअंदाज करते जाना हल्केपन को दिखाता है। रिम्स जैसे 2-4 बड़े सरकारी अस्पतालों को बनाने की ज़रूरत है।
झारखंड सरकार का विकास भी एक निश्चित दायरे में सिमटता दिखाई देता है। हर साल रांची का मेन रोड ज़रूर बन जाता है, कहीं बने या न बने। आप रांची के 10 किलोमीटर के दायरे से ही बाहर निकलने पर कई तस्वीरें देख सकते हैं। रघुबर जी झारखंड में आर्थिक असमानता को बढ़ाने का काम जोर शोर से कर रहे हैं। रेडिशन ब्लू और बीएनआर चाणक्य जैसे होटलों में सरकार की पॉलिसी ज़्यादा बनती है। चकाचौंध के दौर में ग़रीब पीछे ही होते जा रहे हैं।
बजट की राशि हमेशा पर्याप्त ही रही है। कमी है तो बस इच्छाशक्ति और दूरदर्शिता की। सोचिए जो राशि साल भर में ख़र्च नहीं हो पाई, वो तीन महीनें किस तरीक़े से लुटायी जाएगी। रघुबर जी 'तीस मार खां' हो गए हैं।
'आदिवासियों का विकास' जैसे जुमले भी आए हैं। जुमले इसलिए क्योंकि ज़मीन पर काम कीड़ों की तरह सड़ती रहती हैं। पिछले 17 साल से सब दे रहे हैं। सरकार ने हर क्षेत्र में बजट की राशि को कुछ प्रतिशत तक बढ़ाया है। शिक्षा में पिछले साल के मुकाबले 6.31% बढ़ाकर राशि 11,181 करोड़ हो गई। पूरे बजट का लगभग 13% (मोटामोटी) होगा, लेकिन सोचिए कि इतनी बड़ी राशि जाती कहां है। इतना ही समझिए कि बिहार की जो हालत है ठीक वही यहां के सरकारी स्कूलों और प्रणाली की है। मुझे झारखंड में शिक्षा सुधार पर नया कुछ भी सुनने को नहीं मिला है।
रोजगार को लेकर सिर्फ़ हवा बनाया गया है। जो छात्र JPSC और JSSC का फ़ॉर्म भरते हैं उनसे पूछिए क्या हालत है। एक-एक साल तक रोक लगाने के बाद कभी फ़ॉर्म तो कभी एग्जाम ही रद्द हो जाता है। आयोग से लेकर पूरी सरकारी मशीनरी फ़ेल है, लेकिन हवा बनाएंगे पहाड़ पर 200 फ़ीट ऊंचा झंडा फहराकर। बजट के पैसों का कहां उपयोग होता है ये तो मुझे भी नहीं पता।
पिछले एक साल की घटनाओं को देखते हुए स्वास्थ्य के क्षेत्र में 23% की बढ़ोतरी कर बजट को 3,826 करोड़ पहुंचाया गया। अब भी पूरे बजट का 5 फ़ीसदी से भी कम ही है। सरकार स्वास्थ्य की समस्या को गंभीरता से ले ही नहीं पा रही है। नहीं तो आदिवासी और ग़रीबों के विकास के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बनाने पर ज़ोर ज़रूर देती। कुपोषण, एनीमिया जैसी समस्याओं के आंकड़ों को देखने के बाद भी लगातार नज़रअंदाज करते जाना हल्केपन को दिखाता है। रिम्स जैसे 2-4 बड़े सरकारी अस्पतालों को बनाने की ज़रूरत है।
झारखंड सरकार का विकास भी एक निश्चित दायरे में सिमटता दिखाई देता है। हर साल रांची का मेन रोड ज़रूर बन जाता है, कहीं बने या न बने। आप रांची के 10 किलोमीटर के दायरे से ही बाहर निकलने पर कई तस्वीरें देख सकते हैं। रघुबर जी झारखंड में आर्थिक असमानता को बढ़ाने का काम जोर शोर से कर रहे हैं। रेडिशन ब्लू और बीएनआर चाणक्य जैसे होटलों में सरकार की पॉलिसी ज़्यादा बनती है। चकाचौंध के दौर में ग़रीब पीछे ही होते जा रहे हैं।
बजट की राशि हमेशा पर्याप्त ही रही है। कमी है तो बस इच्छाशक्ति और दूरदर्शिता की। सोचिए जो राशि साल भर में ख़र्च नहीं हो पाई, वो तीन महीनें किस तरीक़े से लुटायी जाएगी। रघुबर जी 'तीस मार खां' हो गए हैं।
Comments
Post a Comment