नरेन्द्र दाभोलकर की हत्या को कल (20 अगस्त) 5 साल हो जाएंगे, लेकिन अब तक सीबीआई और पुलिस नाकाम है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने सीबीआई को हाल ही में फ़टकार लगाई थी। सीबीआई हत्या मामले में बार-बार एक ही स्टेटस रिपोर्ट कोर्ट में सौंप रही है। राजनीतिक दबाव जांच एजेंसियों की नई पहचान है। गुजरात के सारे मामलों में देख सकते हैं।
हो सकता है कि यह भी किसी के दबाव में करवाया जा रहा हो। क्योंकि कोर्ट की कई चेतावनियों और समयसीमा के बाद भी सीबीआई हाथ खड़ी की हुई है। हालांकि कल एक व्यक्ति को गिरफ़्तार किया गया, जिसे महाराष्ट्र एटीएस और सीबीआई मुख्य संदिग्ध (आरोपी) बता रही है।
इस समाज में एक बने बनाए ढर्रे पर न चलने का क्या हश्र किया जा सकता है, वही दाभोलकर के साथ हुआ था। सबके साथ हो रहा है। पिछले 5 सालों में कलबुर्गी, पानसरे, गौरी... अभी उमर खालिद और स्वामी अग्निवेश पर जानलेवा हमला हुआ था। अगला नंबर आपका और मेरा हो सकता है। गालियां तो पड़ती ही रहती हैं।
अपना पूरा जीवन अंधविश्वास को ख़त्म करने में लगा देने वाले दाभोलकर को इस समाज ने क्या दिया? क्या हमनें उनके कामों को आगे बढ़ाया? उनका जीवन सीखने लायक है। टीवी मीडिया ने ऐसा माहौल बना दिया कि लोग तो गरियाने वाले को बचाने में लगे रहते हैं।
1982 में ही दाभोलकर ने अंधविश्वास के ख़िलाफ़ काम करना शुरू कर दिया था। 1989 में महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति की स्थापना कर इस काम को ज़ोरदार तरीके से बढ़ाया तो ज़ाहिर सी बात है कि दुश्मन बनने शुरू हो गए होंगे। वे पेशे से डॉक्टर थे। सोचिए जब आज लोग इस तरीके से जान लेने को आतुर हैं तो 30 साल पहले यह कितना जोखिम भरा होगा। अच्छी बात यह है कि पूरे महाराष्ट्र में इस समिति की क़रीब 200 शाखाएं काम कर रही है।
दाभोलकर ने लगातार चमत्कार, ज्योतिष, पाखंड, रूढ़िवादी चीज़ों के ख़िलाफ़ लिखा और बोला। आजीवन इन्हीं चीज़ों का पर्दाफ़ाश करते रहे और लोगों की मानसिकता को वैज्ञानिक दृष्टिकोण की तरफ बढ़ाने का काम करते रहे। यह तो हमारा संविधान भी कहता है। क्या यह समाज के हर एक आदमी को नहीं करना चाहिए? क्या हमें सोते रहना चाहिए और सोचते रहें कि अपने आप ठीक हो जाएगा (जो अक्सर मेरे कई मित्र बोलते हैं।)
दाभोलकर ने किताब में लिखा कि सामान्य घटनाओं के बुनियादी कारणों को ढूंढ़ने की उपेक्षा करना अंधविश्वास, विचारशून्यता और ईश्वर के कोप के भय का निर्माण करता है। यदि सीधे शब्दों में कहें तो लोग व्यवहारिक लाभ के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण को तिलांजलि देते हैं।
साधारण सी बात है कि सामाजिक व्यवस्था के 'आका' और यह सिस्टम आपको बचपन से यथास्थिति में बनाकर रखना चाहता है और हर एक कदम पर वैज्ञानिक ढांचे से दूर ले जाने की कोशिश करता है। यह एक तरह की साज़िश है। जो इस साज़िश के जाल से बाहर निकल खुल कर बोलने और लिखने लगता है उसे गालियां पड़ने लगती हैं और हमले होने लगते हैं।
नरेन्द्र दाभोलकर ने जिन सपनों के साथ जिया, एक बेहतरीन समाज बनाने के लिए अपना जीवन गंवाया, क्या हम उसका सम्मान कर सकते हैं? उनके परिवार को न्याय कब मिलेगा, इसका अंदाज़ा नहीं है। लेकिन अगर आप अंधविश्वास को छोड़कर तर्कशील बनने की ओर आगे बढ़ेंगे तो उनका बलिदान सफ़ल होगा।
मीडिया और सीरियल के द्वारा आपको बीमार करने के लिए पेश की जा रही नई तरह की बुवाबाजी (बाबागिरी) से दूर रहेंगे तो भी दाभोलकर का जीवन सार्थक हो जाएगा। टीवी चैनलों की बाबागिरी पर कई बार बता चुका हूं।
राशिफ़ल, ग्रह-नक्षत्र, ज्योतिष, नाग-नागिन, मंदिर-मस्जिद से दूर होंगे तो आपकी आधी बीमारी ज़रूर दूर हो जाएगी। ये चीज़ें मानसिक ग़ुलामी का ख़तरनाक रूप हैं। हर घटना के पीछे वैज्ञानिक कारण है, इसलिए आगे बढ़ें, इसे समझने की कोशिश करें, वैज्ञानिक दृष्टिकोण को विकसित करें। मानसिक ग़ुलामी को ख़त्म कर ही तर्कसंगत समाज की ओर बढ़ सकते हैं।

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