कल रवीश कुमार के प्राइम टाइम को देख कर लगा कि लोगों को हमेशा मीडिया के लिए नकारात्मक भाव नहीं रखना चाहिए। मीडिया में आने वाले छात्रों को हमेशा नकारात्मकता को छोड़ ऐसे एपिसोड देखकर सीखते रहना चाहिए। जिस तरह से उन्होंने उत्तर प्रदेश के एक गांव के सरकारी स्कूल में एक शिक्षक की समर्पण भाव और वहाँ के शिक्षा व्यवस्था को दिखाया, वह पूरे भारतवर्ष के लिए प्रेरणास्रोत है। न जाने कितने शिक्षक पूरे भारत में प्रेरित हुए होंगे अपने भविष्य को लेकर। देश में शिक्षा के प्रति लोगों का नजरिया बदलने की ये एक सार्थक कोशिश थी। हमारे देश में शिक्षा की जो विभिन्न परतें बनी हुई है, उसकी यह एक झलक थी लेकिन इसके बावजूद उन बच्चों की प्रतिभा देखने लायक है। पूरे कार्यक्रम को देखकर लगा कि शर्ट पर लगा किसी कंपनी का टैग व्यक्ति की पहचान नहीं हो सकता। मैं चाहता हूँ कि आप सभी सोशल मीडिया पर एक बार इस एपिसोड को जरूर देखें।
मैं आजकल सभी छात्रों को मीडिया के एक ही पहलू पर चर्चा करते हुए देखता हूँ। जबकि उनके लिए तमाम विकल्प खुले हुए हैं, जरूरत है चीजों को ढूंढने और समझने की। भारत में तमाम ऐसी समस्याएं हैं जो आजादी के बाद से हैं और अब शाश्वत बनने की राह में खड़ी है। उन्हीं में एक शिक्षा के विभिन्न परतों का बनना भी है। इसके अलावा गरीबी, महंगाई, भूखमरी और भ्रष्टाचार तो गले का फांस बनकर रह ही गया है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि अब पत्रकारिता भी इन सब चीजों से दूर होने लगी है, लेकिन कुछ पत्रकार अभी भी हैं जो सीमाओं में रहकर भी हमें साहस दे रहे हैं। उन्हीं चीजों से सीखते हुए हम मीडिया के प्रति अपनी नकारात्मक छवि को हटाकर समाज के काम आ सकते हैं। कल उन्हें शर्म तो आया ही होगा जो हमेशा से राजनीतिक पक्षपात और स्वार्थ की पत्रकारिता करने में लगे हैं।
सच को सामने लाने का ठेका तो किसी ने नहीं ले रखा है, लेकिन पत्रकारिता का धर्म तो हम निभा ही सकते हैं।
मैं आजकल सभी छात्रों को मीडिया के एक ही पहलू पर चर्चा करते हुए देखता हूँ। जबकि उनके लिए तमाम विकल्प खुले हुए हैं, जरूरत है चीजों को ढूंढने और समझने की। भारत में तमाम ऐसी समस्याएं हैं जो आजादी के बाद से हैं और अब शाश्वत बनने की राह में खड़ी है। उन्हीं में एक शिक्षा के विभिन्न परतों का बनना भी है। इसके अलावा गरीबी, महंगाई, भूखमरी और भ्रष्टाचार तो गले का फांस बनकर रह ही गया है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि अब पत्रकारिता भी इन सब चीजों से दूर होने लगी है, लेकिन कुछ पत्रकार अभी भी हैं जो सीमाओं में रहकर भी हमें साहस दे रहे हैं। उन्हीं चीजों से सीखते हुए हम मीडिया के प्रति अपनी नकारात्मक छवि को हटाकर समाज के काम आ सकते हैं। कल उन्हें शर्म तो आया ही होगा जो हमेशा से राजनीतिक पक्षपात और स्वार्थ की पत्रकारिता करने में लगे हैं।
सच को सामने लाने का ठेका तो किसी ने नहीं ले रखा है, लेकिन पत्रकारिता का धर्म तो हम निभा ही सकते हैं।

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