सच्चा है यहाँ कंगाल,
तो बेईमान है मालामाल
ये पैसा बोलता है.....
'काला बाज़ार' फ़िल्म के इस पूरे गाने को सुनकर देश की स्थिति को अच्छी तरह से समझ सकते हैं।
नोटबंदी की घोषणा हुए 20 दिन हो गए, इस बीच में तरह- तरह की और भी घोषनाएँ हुई जिसने आम लोगों को बैंकों और एटीएम के सामने लंबी क़तारों में लगाए रखा। सियासत तो होनी ही थी, भले ही विपक्ष के पास कोई पुख़्ता सुबूत न हो। उन्हें भी तो जनता के संवेदनाओं के साथ खड़ा रहना है, भले ही वो राजनीति के लिए हो। अब सरकार ने एक और घोषणा की है कि काले धन वाले 50% तक टैक्स देकर अपने पैसे सुरक्षित रख सकते हैं। यानि कि अगर आपके पास 100 करोड़ का काला धन है तो 50% टैक्स के रूप में चुका कर 50 करोड़ रूपये अपने पॉकेट में रख सकते हैं। लगता है कुछ भक्त लोग बच गए थे मोदी जी के घोषणा के पहले पैसे छुपाने में, ये स्कीम तो उन्हीं लोगों के लिए है। जनता को तो मूर्ख समझते ही हैं हमारे हुक़्मरान, इसलिए तो रो कर भी बात करना पड़ता है। ये 30 सितंबर वाली फिर स्कीम क्या थी? ये तो आप उन्हीं से पूछिए।
क्या सरकार वाकई अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में लगी है या सिर्फ कुछ पूँजीपतियों को, जिसके दम पर ये सत्ता पर काबिज़ हुई है। सरकार के निर्णय में अच्छी नियत की कमी तो साफ़ है। देश के 14•5 लाख करोड़ रूपये के कैश को ख़त्म करने के बदले में 1•5 लाख करोड़ रूपये को लाना किस तरह की ज़िम्मेदारी दिखाती है? उसमें भी ऐसे नोट जिसके देने पर जबरन मेट्रो कार्ड में 500 रूपये का रिचार्ज कर दिया जाय या फिर एक दुकान से दूसरे दुकान में भटकना पड़े। सरकार लोगों को कैशलेस होना सिखा रही है या पेटीएम का इस्तेमाल करना, ये समझना ज़रूरी है। क्या सरकार को नहीं पता था कि इससे पूरे देश में छोटे व्यापारियों को नुकसान हो सकता है, लोगों का कामकाज ठप हो सकता है।
6 फीसदी कैश जो काले धन के रूप में है, इसके लिए 86 फीसदी कैश को ख़त्म कर वाहवाही नहीं लूटी जा सकती है। बैंकों के टूटे हुए कमर को सीधी करने का क्या यही एकमात्र रास्ता था? 63 बड़े उद्योगपतियों के 7000 करोड़ रूपये के कर्ज़ को माफ़ करना, क्या 20 दिन से लाइन में लोगों के साथ इंसाफ है या यही देशभक्ति की पहचान है? क्या सरकार का काले धन वालों के साथ 50- 50 करना उन 80 लोगों के साथ इंसाफ है, जो लाइन में लगकर जान गँवा दिए? सिर्फ़ रोने से उन 80 लोगों के परिवारों के दर्द को कम नहीं किया जा सकता, जो सरकार की कमजोर और बनावटी स्कीम का शिकार हुई है।
जब चैनल पर बीजेपी सदस्य किसी भी सवाल का सीधा और तथ्यात्मक जवाब न दें, तो समझिए कि गड़बड़ है जो कि कल के NDTV प्राइम टाइम में हुआ है। उन चैनलों को छोड़ दीजिए जो सरकार की अंधभक्ति में 2000 के नोट में चिप होने की बात तक करने लगते हैं। ख़ैर, सरकार कल जो आय घोषणा स्कीम-2 लेकर आयी है, उसमें सरकार का काले धन के प्रति कोई ठोस कदम नहीं दिखता है। नोटबंदी से सिर्फ़ और सिर्फ़ आम जनता को परेशान किया गया है। क्या इसकी जाँच नहीं होनी चाहिए कि इस वित्तीय वर्ष के दूसरी तिमाही (जुलाई- सितंबर) में 6 लाख करोड़ रूपये बैंक में कैसे जमा हो गए? सरकार की हर बदलती घोषणा सिर्फ़ एक राजनीतिक दाँव लगती है, जिसे आम जनता की भावनाओं को आगे रखकर खेला जा रहा है। कब तक इस देश में 'आख़िरी मौक़ा' वाली स्कीम चलती रहेगी?
अगर सरकार को सही मायनों में काला धन ख़त्म करने की दिलचस्पी है, तो वह राजनीतिक पार्टियों को दिए जाने वाले फंडिंग को सार्वजनिक करने की स्कीम लाए। नोटबंदी के बाद जन- धन खातों में डाली गई 70,000 करोड़ रूपये की जाँच करें। 50- 50 स्कीम के बदले घूसखोरों को कड़ी सजा दिलाने का प्रावधान करे। रियल एस्टेट और आभूषणों के कारोबार में जा रहे अथाह संपत्ति की सख़्ती से जाँच करे। विदेशों में पड़े भारी मात्रा में काले धन को देश में वापस लाने की हिम्मत दिखाए। कोर्ट के द्वारा भगोड़ा घोषित माल्या को देश वापस खींच कर लाएं। 500 करोड़ रूपये वाली शादी के बारे में जनता को भी समझाए। जनता भी जानती है कि असल काला धन कॉरपोरेट, राजनीतिक पार्टियों और सरकार के दलालों के पास है। अगर ये सब करने में सरकार विफल है, तो समझिए मंच पर नाटक चल रहा है और हमलोग भावुक हुए जा रहे हैं।
वैसे कल के स्कीम के बाद लोग ठगा- ठगा सा महसूस तो कर ही रहे हैं।
तो बेईमान है मालामाल
ये पैसा बोलता है.....
'काला बाज़ार' फ़िल्म के इस पूरे गाने को सुनकर देश की स्थिति को अच्छी तरह से समझ सकते हैं।
नोटबंदी की घोषणा हुए 20 दिन हो गए, इस बीच में तरह- तरह की और भी घोषनाएँ हुई जिसने आम लोगों को बैंकों और एटीएम के सामने लंबी क़तारों में लगाए रखा। सियासत तो होनी ही थी, भले ही विपक्ष के पास कोई पुख़्ता सुबूत न हो। उन्हें भी तो जनता के संवेदनाओं के साथ खड़ा रहना है, भले ही वो राजनीति के लिए हो। अब सरकार ने एक और घोषणा की है कि काले धन वाले 50% तक टैक्स देकर अपने पैसे सुरक्षित रख सकते हैं। यानि कि अगर आपके पास 100 करोड़ का काला धन है तो 50% टैक्स के रूप में चुका कर 50 करोड़ रूपये अपने पॉकेट में रख सकते हैं। लगता है कुछ भक्त लोग बच गए थे मोदी जी के घोषणा के पहले पैसे छुपाने में, ये स्कीम तो उन्हीं लोगों के लिए है। जनता को तो मूर्ख समझते ही हैं हमारे हुक़्मरान, इसलिए तो रो कर भी बात करना पड़ता है। ये 30 सितंबर वाली फिर स्कीम क्या थी? ये तो आप उन्हीं से पूछिए।
क्या सरकार वाकई अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में लगी है या सिर्फ कुछ पूँजीपतियों को, जिसके दम पर ये सत्ता पर काबिज़ हुई है। सरकार के निर्णय में अच्छी नियत की कमी तो साफ़ है। देश के 14•5 लाख करोड़ रूपये के कैश को ख़त्म करने के बदले में 1•5 लाख करोड़ रूपये को लाना किस तरह की ज़िम्मेदारी दिखाती है? उसमें भी ऐसे नोट जिसके देने पर जबरन मेट्रो कार्ड में 500 रूपये का रिचार्ज कर दिया जाय या फिर एक दुकान से दूसरे दुकान में भटकना पड़े। सरकार लोगों को कैशलेस होना सिखा रही है या पेटीएम का इस्तेमाल करना, ये समझना ज़रूरी है। क्या सरकार को नहीं पता था कि इससे पूरे देश में छोटे व्यापारियों को नुकसान हो सकता है, लोगों का कामकाज ठप हो सकता है।
6 फीसदी कैश जो काले धन के रूप में है, इसके लिए 86 फीसदी कैश को ख़त्म कर वाहवाही नहीं लूटी जा सकती है। बैंकों के टूटे हुए कमर को सीधी करने का क्या यही एकमात्र रास्ता था? 63 बड़े उद्योगपतियों के 7000 करोड़ रूपये के कर्ज़ को माफ़ करना, क्या 20 दिन से लाइन में लोगों के साथ इंसाफ है या यही देशभक्ति की पहचान है? क्या सरकार का काले धन वालों के साथ 50- 50 करना उन 80 लोगों के साथ इंसाफ है, जो लाइन में लगकर जान गँवा दिए? सिर्फ़ रोने से उन 80 लोगों के परिवारों के दर्द को कम नहीं किया जा सकता, जो सरकार की कमजोर और बनावटी स्कीम का शिकार हुई है।
जब चैनल पर बीजेपी सदस्य किसी भी सवाल का सीधा और तथ्यात्मक जवाब न दें, तो समझिए कि गड़बड़ है जो कि कल के NDTV प्राइम टाइम में हुआ है। उन चैनलों को छोड़ दीजिए जो सरकार की अंधभक्ति में 2000 के नोट में चिप होने की बात तक करने लगते हैं। ख़ैर, सरकार कल जो आय घोषणा स्कीम-2 लेकर आयी है, उसमें सरकार का काले धन के प्रति कोई ठोस कदम नहीं दिखता है। नोटबंदी से सिर्फ़ और सिर्फ़ आम जनता को परेशान किया गया है। क्या इसकी जाँच नहीं होनी चाहिए कि इस वित्तीय वर्ष के दूसरी तिमाही (जुलाई- सितंबर) में 6 लाख करोड़ रूपये बैंक में कैसे जमा हो गए? सरकार की हर बदलती घोषणा सिर्फ़ एक राजनीतिक दाँव लगती है, जिसे आम जनता की भावनाओं को आगे रखकर खेला जा रहा है। कब तक इस देश में 'आख़िरी मौक़ा' वाली स्कीम चलती रहेगी?
अगर सरकार को सही मायनों में काला धन ख़त्म करने की दिलचस्पी है, तो वह राजनीतिक पार्टियों को दिए जाने वाले फंडिंग को सार्वजनिक करने की स्कीम लाए। नोटबंदी के बाद जन- धन खातों में डाली गई 70,000 करोड़ रूपये की जाँच करें। 50- 50 स्कीम के बदले घूसखोरों को कड़ी सजा दिलाने का प्रावधान करे। रियल एस्टेट और आभूषणों के कारोबार में जा रहे अथाह संपत्ति की सख़्ती से जाँच करे। विदेशों में पड़े भारी मात्रा में काले धन को देश में वापस लाने की हिम्मत दिखाए। कोर्ट के द्वारा भगोड़ा घोषित माल्या को देश वापस खींच कर लाएं। 500 करोड़ रूपये वाली शादी के बारे में जनता को भी समझाए। जनता भी जानती है कि असल काला धन कॉरपोरेट, राजनीतिक पार्टियों और सरकार के दलालों के पास है। अगर ये सब करने में सरकार विफल है, तो समझिए मंच पर नाटक चल रहा है और हमलोग भावुक हुए जा रहे हैं।
वैसे कल के स्कीम के बाद लोग ठगा- ठगा सा महसूस तो कर ही रहे हैं।


जो दूसरों के लिए गड्ढा खोदते हैं वो खुद गड्ढे मेंं गिरते हैं। बीजेपी की भी उलटी गिनती शुरू हो गई।
ReplyDeleteये एक बहुत बड़ी साजिश है, जिसमें एक तीर से बहुत सारे चीजों को ध्वस्त किया गया है। इसलिए सरकार के सभी निर्णय को जनता को व्यवहारिक रूप से समझाना ज़रूरी है। नहीं तो ये संगठित लूट देश के अंदर चलती रहेगी।
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