फ़िल्म 'मदारी' हमारे पूरे राजनीतिक और प्रशासनिक सिस्टम की शिथिलता को समझाने के लिए बनाई गई और मुझे लगता भी है कि ये फ़िल्म सिस्टम पर बहुत बड़ा तमाचा है। डायरेक्टर निशिकांत कामत ने पूरी कोशिश की है कि हम देश के अंदर व्याप्त भ्रष्टाचार, लालफीताशाही और नेताओं के स्वार्थ को आसानी से समझ सके। फ़िल्म दृश्यम के जैसे ही कामत साहब ने इसे भी थ्रिलर बनाने की कोशिश की है। उनकी ये कोशिश पूरी भी हुई है लेकिन जितनी आसानी से इसे फ़िल्माया गया है ऐसा वाकई में होता नहीं है। बहुत सारे सीन को देखकर दर्शकों को पहले से ही संकेत मिल जाते हैं। फ़िल्म की शुरुआत का एक डायलॉग- "बाज़ चूजे पर झपटा उठा ले गया, कहानी सच्ची लगती है, लेकिन अच्छी नहीं लगती। बाज़ पर पलटवार हुआ कहानी सच्ची नहीं लगती, लेकिन ख़ुदा क़सम बहुत अच्छी लगती है।" हमें बता देता है कि कहानी संघर्ष की है।
फ़िल्म की पहली सीन में ही पता चल जाता है कि निर्मल (इरफान ख़ान) गृह मंत्री के बच्चे का अपहरण कर लेता है। उसके बाद के सीन में पूरी अफरा- तफरी को दिखाया जाता है, किस तरह नेता अपहरण के मुद्दे पर मीडिया, विपक्ष हर किसी को शांत करवाने में लगा रहता है जो कि वास्तविक लगता है। फ़िल्म के बीच में इरफ़ान ख़ान का एक डायलॉग आता है- "मैं एक आदर्श वोटर था, अपने घर- परिवार को चलाने में व्यस्त था। जो सपने दिखाया जाता था वो देखता था। टीवी, अख़बार जो बता दे उसे मान लेता था, लेकिन तुम मेरी दुनिया मुझसे छीनोगे मैं तुम्हारी दुनिया में घुस जाऊँगा।" ये बहुत ही झकझोड़ने वाला है और उसके खोये हुए बेटे का दर्द निकल आता है।
फ़िल्म के गाने कुछ ख़ास नहीं है, लेकिन 'दमा दमा दम दम दम दम.....' थीम साँग के रुप में पूरी फ़िल्म में चलाया जाता है। दूसरा गाना 'मासूम सा' फ़िल्म के भावुक पलों को बाँधने में सहायक हो जाता है। यही जगह- जगह पर दोहराया भी जाता है।
इरफ़ान ख़ान ने एक बार फिर अपनी छाप छोड़ी है। अपने ही अंदाज़ में अभिनय कर पूरी फ़िल्म में जान डाला है। नेचुरल और सादगी भरा अभिनय कहानी के हिसाब से ढलता चला जाता है। रोहन( गृहमंत्री का बेटा ) भी अपने किरदार को सही तरीके से निभा लेता है। जिमी शेरगिल ने भी 'अ वेड्नेसडे' के जैसा सही रोल अदा किया है। एक क़ाबिल ऑफिसर के रुप में वो फिट बैठते हैं। फ़िल्म के अंत तक दोनों लीड एक्टर ने पूरी मेहनत की है। चुँकि फ़िल्म में तीन टाइमलाइन एक साथ चलती है, जो अच्छी क्लाईमैक्स तैयार करती है और हमें बाँध कर भी रखती है।
रितेश शाह के डायलॉग के साथ फ़िल्म के सभी किरदारों ने इंसाफ़ नहीं किया, लेकिन इरफ़ान ख़ान ने अपने दम पर इसे भी जानदार बना ही दिया। निर्मल जब गृहमंत्री को फ़ोन कॉल पर ये डायलॉग- "आवाज़ के तेवर से लगा कि कोई बड़ा बोला, लेकिन आवाज़ में कुछ था उससे लगा कि एक बाप बोला।" ऐसे कई डायलॉग दम भरते हैं। फ़िल्म की सिनेमेटोग्राफी में अविनाश अरुण ने मेहनत की है। जिससे फ़िल्म जिस इमोशन को दिखाना चाहती है, उसे पूरा कर पाती है। बहुत जगहों पर कैमरे के सही फ्रेमिंग का प्रयोग हुआ है, जो इमोशनल टच को दिलाने में कामयाब होती है। दर्शक ऐसे दृश्यों में फ़िल्म के पात्रों के साथ जुड़ते चले जाते हैं।
कुल मिलाकर निशिकांत कामत की दृश्यम के बाद एक और अच्छी फ़िल्म है। फ़िल्म बताती है कि किस तरह हमारा सिस्टम मदारी बनकर हमें असल ज़िन्दगी में नचाता है। करप्शन की मार हर आम आदमी झेलता है, लेकिन उससे लड़ने का तरीका फ़िल्म में आसानी से मिल जाता है, भले ही असल में इतनी आसानी से न हो। सिस्टम की गंदगियों को कई फ़िल्मों में पहले भी दिखाया गया है। लेकिन शैलजा केजरीवाल ने थोड़ा अलग लिखकर इस कहानी को मजेदार बनाया। 2 घंटे तक इस कहानी को चलाकर दर्शकों को बाँधकर रखने में निशिकांत कामत ने पूरी मेहनत की है। इरफ़ान ख़ान के अभिनय की तारीफ़ होनी चाहिए। इसलिए मेरी तरफ़ से फ़िल्म को 3.5 स्टार मिलनी चाहिए।

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