नजीब को जेएनयू से ग़ायब हुए कल पूरे 5 महीने हो गए, लेकिन अभी तक उसका कुछ पता नहीं चल पाया है। जब भी नजीब की माँ बदायूँ से जेएनयू आती है, तो इसी उम्मीद में कि वो इस बार नजीब को साथ लेकर जाएगी। अब तक वह असफ़ल रही हैं, लेकिन हिम्मत की कमी नहीं है। उनकी इस लड़ाई में जेएनयू के छात्रों ने गज़ब का साथ दिया है। ग्रामीण इलाकों में ग़रीबों और पिछड़ों के लिखवाए गए एफआईआर को ख़ुद ही वापस ले लेना होता है। मैं यह सोच कर सहम जाता हूँ कि वो माँ दिन में कितनी बार नजीब के लिए रोती होगी। नजीब के लिए न्याय की मांग अब धुंधली नज़र आने लगी है।
कल शाम जेएनयू में साबरमती ढ़ाबे पर जब वो बोल रही थी, तो वहाँ पहले की अपेक्षा कम भीड़ जुटी थी। शायद छात्रों ने अब उम्मीद लगानी छोड़ दी है, लेकिन नजीब की माँ आज भी पूरे सिस्टम से लड़ने को तैयार है। उसमें वह हम छात्रों की भागीदारी को अहम मानती है। जेएनयू के छात्र नजीब को वापस लाने की लड़ाई लगातार लड़ रहे हैं। उनका मानना है कि अगर छात्र इस देश की सत्ता के ख़िलाफ़ एक साथ खड़े हो गए, तो फिर इतिहास बदल सकता है। सच्चाई और इंसाफ़ की लड़ाई लड़ने के लिए वह किसी भी ताकत से लड़ने को तैयार हैं।
वाकई लकवाग्रस्त सियासत को ठीक करने का असल हथियार छात्रों का आवाज़ बनकर उभरना है। लेकिन पिछले एक साल में रोहित वेमुला, नजीब, मुत्थुकृष्णन और न जाने कितने छात्रों का अचानक हमारे बीच से चले जाना हमें आगाह करता है। हमें अपनी आँख खोलने की ज़रूरत है। आख़िर क्यों बड़े विश्वविद्यालयों में पीएचडी और एमफ़िल कर रहे ये छात्र हमारे बीच से ग़ायब हो जा रहे हैं? क्या इनका चले जाना या ग़ायब होना हमें सतर्क नहीं करता? ये सभी सामाजिक अधिकार और हक़ की लड़ाई लड़ने वाले छात्र थे। कहीं बराबरी और हक़ की बात करना, इनके गले का फांस तो नहीं बन गया। मीडिया में आने के कारण हम इनके बारे में जान पाए, नहीं तो देश में रोज इस तरह की सैकड़ों घटनाएँ घटती है और पुलिस एफआईआर तक दर्ज नहीं करती। नजीब के इस मामले में, शुरूआती दिनों की पुलिस की लापरवाही ने इसे और पेचीदा बना दिया। पुलिस की कार्रवाई अगर सख़्त रवैये वाली होती, तो शायद नजीब उन्हीं दिनों हमारे बीच होता।
मुझे पता है, हुक्मरानों को इन आवाज़ों से कोई फ़र्क नहीं पड़ता है। वो पत्थर दिल हैं और कानों में रूई की मोटी परतें लगाकर बैठे हैं। उन्हें एक, दो या दो सौ के जाने का भी ग़म नहीं हो सकता। उन्हें बस बोलना आता है, वो भी हमें बाँटने के बाद। ब्रांडेड क़ानून व्यवस्था के बीच आपकी आवाज़ नहीं सुनी जाएगी, यह तो तय है। लेकिन इस माँ की पुकार को सुनिए और उनकी करूणा को समझिए। हम छात्रों को नजीब की माँ ने एकता की मिसाल बनने को कहा है। ये हमें समझना होगा, नहीं तो हक़ की बात करने से आसान तलवे चाटना तो है ही। इस लिंक को खोल कर वीडियो को देखिए और सोचने, समझने की कोशिश कीजिए।
वो आज 150 दिन बाद भी नजीब को जेएनयू से वापस लेने आई थीं।
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=759367627561839&id=100004658254499
कल शाम जेएनयू में साबरमती ढ़ाबे पर जब वो बोल रही थी, तो वहाँ पहले की अपेक्षा कम भीड़ जुटी थी। शायद छात्रों ने अब उम्मीद लगानी छोड़ दी है, लेकिन नजीब की माँ आज भी पूरे सिस्टम से लड़ने को तैयार है। उसमें वह हम छात्रों की भागीदारी को अहम मानती है। जेएनयू के छात्र नजीब को वापस लाने की लड़ाई लगातार लड़ रहे हैं। उनका मानना है कि अगर छात्र इस देश की सत्ता के ख़िलाफ़ एक साथ खड़े हो गए, तो फिर इतिहास बदल सकता है। सच्चाई और इंसाफ़ की लड़ाई लड़ने के लिए वह किसी भी ताकत से लड़ने को तैयार हैं।
वाकई लकवाग्रस्त सियासत को ठीक करने का असल हथियार छात्रों का आवाज़ बनकर उभरना है। लेकिन पिछले एक साल में रोहित वेमुला, नजीब, मुत्थुकृष्णन और न जाने कितने छात्रों का अचानक हमारे बीच से चले जाना हमें आगाह करता है। हमें अपनी आँख खोलने की ज़रूरत है। आख़िर क्यों बड़े विश्वविद्यालयों में पीएचडी और एमफ़िल कर रहे ये छात्र हमारे बीच से ग़ायब हो जा रहे हैं? क्या इनका चले जाना या ग़ायब होना हमें सतर्क नहीं करता? ये सभी सामाजिक अधिकार और हक़ की लड़ाई लड़ने वाले छात्र थे। कहीं बराबरी और हक़ की बात करना, इनके गले का फांस तो नहीं बन गया। मीडिया में आने के कारण हम इनके बारे में जान पाए, नहीं तो देश में रोज इस तरह की सैकड़ों घटनाएँ घटती है और पुलिस एफआईआर तक दर्ज नहीं करती। नजीब के इस मामले में, शुरूआती दिनों की पुलिस की लापरवाही ने इसे और पेचीदा बना दिया। पुलिस की कार्रवाई अगर सख़्त रवैये वाली होती, तो शायद नजीब उन्हीं दिनों हमारे बीच होता।
मुझे पता है, हुक्मरानों को इन आवाज़ों से कोई फ़र्क नहीं पड़ता है। वो पत्थर दिल हैं और कानों में रूई की मोटी परतें लगाकर बैठे हैं। उन्हें एक, दो या दो सौ के जाने का भी ग़म नहीं हो सकता। उन्हें बस बोलना आता है, वो भी हमें बाँटने के बाद। ब्रांडेड क़ानून व्यवस्था के बीच आपकी आवाज़ नहीं सुनी जाएगी, यह तो तय है। लेकिन इस माँ की पुकार को सुनिए और उनकी करूणा को समझिए। हम छात्रों को नजीब की माँ ने एकता की मिसाल बनने को कहा है। ये हमें समझना होगा, नहीं तो हक़ की बात करने से आसान तलवे चाटना तो है ही। इस लिंक को खोल कर वीडियो को देखिए और सोचने, समझने की कोशिश कीजिए।
वो आज 150 दिन बाद भी नजीब को जेएनयू से वापस लेने आई थीं।
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