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सावित्रीबाई फुले: देश की पहली महिला शिक्षिका या समाज की महानायिका?

ज़रा सोचिए, आज 21वीं सदी में समान शिक्षा देने में हमारा समाज जब असमंजस में जी रहा है, तो लगभग 200 साल पहले की हालत क्या होगी। शीर्षक में सावित्रीबाई फुले को देश की पहली महिला शिक्षिका या समाज की महानायिका होने पर प्रश्न चिह्न इसलिए, क्योंकि आज तक समाज के कुछ ठेकेदारों ने उस नाम को आम जनों के बीच प्रसिद्ध नहीं होने दिया।
आप आज के सियासत का प्लैटफार्म माने जाने वाले ट्विटर के ट्रेंड को भी देखिए, तो शिक्षक दिवस डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन तक सिमटती नज़र आती है।
शिक्षक दिवस को हम भले राधाकृष्णन के जन्मदिन के रूप में मना कर इसके दायरे को सीमित कर लें, लेकिन इतिहास में शिक्षकों और समाज उत्थान के संबंधों को विस्तार से देखना ज़रूरी है।
वैसे तो इतिहास ने सावित्रीबाई को बहुत कम जगह दी है, लेकिन बहुजन के लिए वो एक महानायिका हैं। आख़िर शिक्षक दिवस के दिन सावित्रीबाई फुले को हम क्यों याद कर रहे हैं, उनका इतिहास हमारे आधुनिक समाज को जानना क्यों ज़रूरी है, इसके लिए 19वीं सदी की इस क्रांतिकारी महिला के बारे कुछ ख़ास बातें जाननी ज़रूरी है...
  • 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा ज़िले के नायगांव में जन्मी सावित्रीबाई का विवाह मात्र 9 साल की उम्र में ज्योतिराव फुले(13) के साथ हो गया। ज्योतिराव ने घर में ही सावित्रीबाई को पढ़ाया।
  • 22 नवंबर 1851 बॉम्बे गार्जियन अख़बार में छपी एक ख़बर के मुताबिक, सावित्रीबाई के आगे की शिक्षा की ज़िम्मेदारी ज्योतिराव ने अपने मित्र सखाराम यशवंत परांजपे और केशव शिवराम भावलकर को दे दिया।
  • सावित्रीबाई और ज्योतिराव ने कोई बच्चा पैदा नहीं किया, जबकि रूढ़ियों को तोड़ते हुए एक ब्राह्मण विधवा के बच्चे यशवंत को गोद लिया और उसे पाल पोषकर डॉक्टर बनाया।
  • सन 1848 में ज्योतिराव ने पुणे में लड़कियों के लिए देश का पहला महिला स्कूल खोला। देश की पहली महिला शिक्षक, जो अब तक अपने घरों में लड़कियों को पढ़ा रही थी, उसमें सावित्रीबाई को प्रधानाध्यापक बनाया।
  • सावित्रीबाई और उनके पति क्रांतिकारी ज्योतिराव फुले ने दलितों और महिलाओं के लिए लड़ाई जारी रखते हुए सन 1848 से लेकर 1852 के बीच 18 स्कूल खोल डाले। सावित्रीबाई ने ब्राह्मणवाद और जातिवाद से दबे समाज में अंग्रेज़ी शासन को विकल्प के रूप में देखा, क्योंकि इसमें शिक्षा की व्यवस्था सबको मिल रही थी।
  • शिक्षित और संगठित होकर और जाति के बंधनों को तोड़ने की बात बाबा साहेब अंबेडकर से पहले सावित्रीबाई ने भी अपनी कविताओं में की थी। उसने पूरी ज़िन्दगी छूआछूत, बाल विवाह, विधवा विवाह निषेध करने को लेकर लड़ाई लड़ती रही।
  • जब वो स्कूलों में पढ़ाने जाती थीं, तो लोग रास्ते में उन पर कीचड़ और गोबर फेंका करते थे, इसलिए सावित्रीबाई अपने थैले में दूसरी साड़ी लेकर चलती थी और स्कूल में बदल लिया करती थीं।
  • सन 1854 में उनकी पहली पुस्तक 'काव्य फुले' प्रकाशित हुई थी। इसके अलावा सावित्रीबाई ने कई कविताओं और भाषणों से वंचित समाज को जगाया, लेकिन अभी भी उनकी कहानी देश की 70 प्रतिशत से ज़्यादा आबादी से दूर है।
  • 24 सितंबर 1873 को ज्योतिराव फुले ने 'सत्यशोधक समाज' की स्थापना की, जो दहेज मुक्त और बिना पंडित पुजारियों के विवाह संपन्न कराती थी। सावित्रीबाई इस संस्था की एक सक्रिय कार्यकर्ता बनी। बाद में सावित्रीबाई ने अपने दत्तक पुत्र यशवंत का इसी संस्था के तहत पहला अंतरजातीय विवाह करवाया।
  • 28 नवंबर 1890 को अपने पति ज्योतिबा फुले के मरने के बाद, सावित्रीबाई लगातार उनके अधूरे समाज सुधारक कार्यों में लगी रहीं। 1896 में पुणे में आए भीषण अकाल में इस क्रांतिकारी महिला ने पीड़ितों की काफी सहायता की।
  • इसके साल भर बाद ही पूरा पुणे प्लेग की चपेट में आ गया, जिसमें सैकड़ों बच्चे मर रहे थे। सावित्रीबाई ने बेटे यशवंत को बुलाकर एक हॉस्पिटल खुलवाया, जिसमें वह ख़ुद दिन- रात मरीजों की देखभाल करने लग गई। आख़िरकार 10 मार्च 1897 को सावित्रीबाई ख़ुद इस संक्रामक बीमारी की चपेट में आकर दुनिया को छोड़ गई।
  • सावित्रीबाई फुले मरने के बाद एक शिक्षिका, समाज सुधारक के रूप में भारतीय इतिहास के महानायिकाओं की फ़ेहरिस्त में शुमार हो गई। लेकिन हमारे ज्ञानी पंडितों ने इस क्रांतिकारी महिला के समाज में योगदान को सामान्य ज्ञान के 'वस्तुनिष्ठ प्रश्न' तक ही छोड़ दिया। इसलिए हमें ज़रूरत है कि सावित्रीबाई के उल्लेखनीय योगदानों को भविष्य का खांका खींचने में उपयोग किया जाए।
सम्मान...
भारतीय डाक ने 10 मार्च 1998 को सावित्रीबाई के सम्मान के रूप में डाक टिकट जारी किया।
साल 2015 में पुणे विश्वविद्यालय का नाम सावित्रीबाई फुले विश्वविद्यालय किया गया।
इसी साल 3 जनवरी 2017 को गूगल ने सावित्रीबाई फुले के 186वीं जयंती पर अपना 'गूगल डूडल' बनाया।

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