तस्वीर- HT
बिहार सरकार ने अपने आर्थिक सर्वेक्षण 2018-19 के एक पन्ने पर लिखा है कि मानव विकास के सभी स्तरों पर किसी भी व्यक्ति की तीन अनिवार्य पसंद होती हैं- स्वस्थ और लंबी ज़िंदगी जीना, ज्ञान प्राप्त करना और अच्छे जीवन स्तर के लिए आवश्यक संसाधनों तक पहुंच होना। कुछ नया नहीं है, ये समाज में रह रहे लोगों के लिए मूलभूत बातें हैं। लंबी ज़िंदगी तो नहीं, लेकिन जितने दिन व्यक्ति जी रहा है उसे एक लोककल्याणकारी राज्य के ज़रिए अच्छी और मुफ़्त स्वास्थ्य सुविधा ज़रूर मिलनी चाहिए।
2 लाख करोड़ रुपये के बजट में सरकार ने स्वास्थ्य क्षेत्र को 9,622 करोड़ रुपये (कुल बजट का 4.8 फ़ीसदी) दिए हैं, जो साल 2018-2019 में स्वास्थ्य के क्षेत्र में आवंटित किए गए रकम से 1,829 करोड़ अधिक हैं। बजट में राज्य के अंदर 11 नए मेडिकल कॉलेज खोलने की घोषणा हुई है, जो केंद्र और राज्य के द्वारा मिलकर बनाया जाएगा। इसमें छपरा, पूर्णिया, समस्तीपुर, बेगूसराय, सीतामढ़ी, वैशाली, झंझारपुर, सीवान, बक्सर, भोजपुर और जमुई में कॉलेज का निर्माण होगा। साथ ही नालंदा में एक डेंटल कॉलेज बनाने की भी योजना है।
पीएमसीएच को विश्वस्तरीय बनाने के लिए 5,540 करोड़ रुपये की स्वीकृति मिली है। वहीं इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (IGIMS) में 100 बेड वाला राज्य स्तरीय कैंसर संस्थान खोला जाएगा, जिसके लिए 138 करोड़ रुपये आवंटित होंगे। आयुष्मान योजना के तहत 335 करोड़ रुपये दिए जाएंगे। जो दिया जाना है और जो बनेगा, उसके होने या बनने का अभी इंतज़ार करते हैं।
सरकार कह रही है कि स्वास्थ्य को केंद्र में रखा गया है। बजट की घोषणाओं में तो बिल्कुल केंद्र में रखा गया है, लेकिन ज़मीन पर स्वास्थ्य सेवा परिधि पर घूमती नज़र आ रही है। बिहार का आर्थिक सर्वेक्षण राज्य में स्वास्थ्य के मोर्चे पर सरकार की विफलता की कहानी को गढ़ता है।
अस्पतालों की ऑक्यूपेंसी रेट में कमी
सरकार ख़ुद बता रही है कि पूरे राज्य में अस्पताल पहुंचने वाले वाह्यरोगियों की औसत दैनिक संख्या में कमी आई है। बेड ऑक्यूपेंसी रेट और भर्ती रहने की अवधि ऐसे दो पैमाने हैं जो किसी अस्पताल के काम करने की दक्षता को बयां करता है। आर्थिक सर्वे में सीधे तौर पर लिखा है कि बिहार में बेड ऑक्यूपेंसी रेट का 2015-16 के 84 फ़ीसदी से घटकर 2017-18 में 62 फ़ीसदी हो गई है। बिहार के स्वास्थ्य सेवाओं में निजी क्षेत्र का यह बहुत बड़ा दखल है।
सरकार ने यह भी कहा है कि मुज़फ़्फ़रपुर में बेड ऑक्यूपेंसी रेट जहां 329%, भागलपुर में 181% और मधेपुरा में 159% है, वहीं शिवहर में 16%, नवादा में 20% और पटना में 22% है। मुज़फ़्फ़रपुर, भागलपुर और मधेपुरा के आंकड़े बताते हैं सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा की कितनी ज़रूरत है। इसके अलावा सरकारी अस्पतालों में पहुंचने वाले रोगियों की औसत मासिक संख्या में भी कमी आई है।
डॉक्टरों की भारी कमी
आर्थिक सर्वे के अनुसार, राज्य में डॉक्टरों के लिए 7,249 स्वीकृत पद हैं, लेकिन 3,146 नियमित डॉक्टर ही कार्यरत हैं। यानी 57 फ़ीसदी पद खाली। संविदा डॉक्टरों की बात करें तो 2,314 स्वीकृत पदों में 533 ही भरे हुए थे। माने कि 77 फ़ीसदी पद खाली। क्या होगा बिहार का?
वहीं ग्रेड-ए नर्स की स्वीकृत 4,704 पदों में सिर्फ़ 2,096 ही कार्यरत हैं। और एएनएम (सहायक नर्सों) की स्वीकृत 21,859 पदों में 12,134 ही भरे हुए हैं। आशा कार्यकर्ताओं की संख्या अनुपातिक रूप से सही है। 93,687 स्वीकृत पदों में 93 फ़ीसदी यानी 85,708 कार्यरत हैं लेकिन आए दिन अपनी न्यूनतम वेतन की मांगों को लेकर सरकार से गुहार करती रहती हैं।
हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, बिहार स्वास्थ्य सेवा संगठन के महासचिव डॉक्टर रंजीत कुमार ने पिछले महीने बताया था कि राज्य में 70 फ़ीसदी तक डॉक्टरों की कमी है। स्वास्थ्य विभाग (ज़िला अस्पताल से लेकर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र/उपकेंद्र) में 11,393 स्वीकृत पदों में मात्र 2,700 नियमित डॉक्टर हैं। उनके अनुसार, मेडिकल कॉलेजों में असिस्टेंट प्रोफेसर और प्रोफ़ेसरों की 65% तक कमी है।
हालत ये हो गई है कि सरकार बिना किसी लिखित टेस्ट या इंटरव्यू के 3,100 डॉक्टरों की भर्ती करने वाली है। इस पर बिहार के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे ने ये तर्क दिया था कि एमबीबीएस की पढ़ाई के दौरान छात्रों को कम से कम 9 परीक्षाएं देनी ही पड़ती हैं।
रंजीत कुमार ने बताया कि WHO कहता है कि हर 1000 लोगों पर एक डॉक्टर होना चाहिए। 1983 में केंद्र सरकार द्वारा तैयार पहली स्वास्थ्य नीति में कहा गया कि हरेक 3,500 की आबादी पर एक डॉक्टर होना चाहिए। लेकिन बिहार में हर 50,000 की आबादी पर एक डॉक्टर है।
अभी राज्य में 37 ज़िला अस्पताल, 70 रेफरल अस्पताल, 55 अनुमंडल अस्पताल, 533 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, 9,949 उप-केंद्र और 1,379 अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र मौजूद हैं। सरकार ने 533 में से 399 स्वास्थ्य केंद्रों को अपग्रेड कर 30 बेड वाले सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में बदलने की योजना बनाई है।
इन केंद्रों और ज़िला अस्पतालों की ऐसी दुर्गति की गई है कि लोग भरोसा तक नहीं करते हैं और हर कोई प्राइवेट डॉक्टरों के यहां हज़ारों/लाखों ख़र्च करने पर मजबूर हैं और संतुष्ट भी हैं। मैं बेगूसराय जाने पर सदर अस्पताल जाता ही हूं और वहां की स्थितियों का एक प्रत्यक्ष गवाह हूं। लोगों को आधी से ज़्यादा दवाईयों के लिए बाज़ार में भेजा जाता है। जांच की सुविधा निजी अस्पतालों में कराने की नेक सुविधा कर्मचारियों द्वारा दी जाती है। कई जगहों पर मेडिकल की एक्स-रे, अल्ट्रासाउंड, सिटी स्कैन, एमआरआई जैसी बेसिक तकनीकी सुविधाएं नहीं हैं।
जितना मैंने लिखा है ये ऊपरी बातें हैं, इनकी तह तक जाने में आप भी बीमार हो सकते हैं। सरकार बजट के दौरान शेर-ओ-शायरी के ज़रिये एक सीधा-सपाट लब्बोलुआब देकर आपको मूर्ख बनाती है और फिर आप अख़बार व टेलीविज़न की हेडलाइन में खो जाते हैं।
बिहार सरकार ने अपने आर्थिक सर्वेक्षण 2018-19 के एक पन्ने पर लिखा है कि मानव विकास के सभी स्तरों पर किसी भी व्यक्ति की तीन अनिवार्य पसंद होती हैं- स्वस्थ और लंबी ज़िंदगी जीना, ज्ञान प्राप्त करना और अच्छे जीवन स्तर के लिए आवश्यक संसाधनों तक पहुंच होना। कुछ नया नहीं है, ये समाज में रह रहे लोगों के लिए मूलभूत बातें हैं। लंबी ज़िंदगी तो नहीं, लेकिन जितने दिन व्यक्ति जी रहा है उसे एक लोककल्याणकारी राज्य के ज़रिए अच्छी और मुफ़्त स्वास्थ्य सुविधा ज़रूर मिलनी चाहिए।
2 लाख करोड़ रुपये के बजट में सरकार ने स्वास्थ्य क्षेत्र को 9,622 करोड़ रुपये (कुल बजट का 4.8 फ़ीसदी) दिए हैं, जो साल 2018-2019 में स्वास्थ्य के क्षेत्र में आवंटित किए गए रकम से 1,829 करोड़ अधिक हैं। बजट में राज्य के अंदर 11 नए मेडिकल कॉलेज खोलने की घोषणा हुई है, जो केंद्र और राज्य के द्वारा मिलकर बनाया जाएगा। इसमें छपरा, पूर्णिया, समस्तीपुर, बेगूसराय, सीतामढ़ी, वैशाली, झंझारपुर, सीवान, बक्सर, भोजपुर और जमुई में कॉलेज का निर्माण होगा। साथ ही नालंदा में एक डेंटल कॉलेज बनाने की भी योजना है।
पीएमसीएच को विश्वस्तरीय बनाने के लिए 5,540 करोड़ रुपये की स्वीकृति मिली है। वहीं इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (IGIMS) में 100 बेड वाला राज्य स्तरीय कैंसर संस्थान खोला जाएगा, जिसके लिए 138 करोड़ रुपये आवंटित होंगे। आयुष्मान योजना के तहत 335 करोड़ रुपये दिए जाएंगे। जो दिया जाना है और जो बनेगा, उसके होने या बनने का अभी इंतज़ार करते हैं।
सरकार कह रही है कि स्वास्थ्य को केंद्र में रखा गया है। बजट की घोषणाओं में तो बिल्कुल केंद्र में रखा गया है, लेकिन ज़मीन पर स्वास्थ्य सेवा परिधि पर घूमती नज़र आ रही है। बिहार का आर्थिक सर्वेक्षण राज्य में स्वास्थ्य के मोर्चे पर सरकार की विफलता की कहानी को गढ़ता है।
अस्पतालों की ऑक्यूपेंसी रेट में कमी
सरकार ख़ुद बता रही है कि पूरे राज्य में अस्पताल पहुंचने वाले वाह्यरोगियों की औसत दैनिक संख्या में कमी आई है। बेड ऑक्यूपेंसी रेट और भर्ती रहने की अवधि ऐसे दो पैमाने हैं जो किसी अस्पताल के काम करने की दक्षता को बयां करता है। आर्थिक सर्वे में सीधे तौर पर लिखा है कि बिहार में बेड ऑक्यूपेंसी रेट का 2015-16 के 84 फ़ीसदी से घटकर 2017-18 में 62 फ़ीसदी हो गई है। बिहार के स्वास्थ्य सेवाओं में निजी क्षेत्र का यह बहुत बड़ा दखल है।
सरकार ने यह भी कहा है कि मुज़फ़्फ़रपुर में बेड ऑक्यूपेंसी रेट जहां 329%, भागलपुर में 181% और मधेपुरा में 159% है, वहीं शिवहर में 16%, नवादा में 20% और पटना में 22% है। मुज़फ़्फ़रपुर, भागलपुर और मधेपुरा के आंकड़े बताते हैं सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा की कितनी ज़रूरत है। इसके अलावा सरकारी अस्पतालों में पहुंचने वाले रोगियों की औसत मासिक संख्या में भी कमी आई है।
डॉक्टरों की भारी कमी
आर्थिक सर्वे के अनुसार, राज्य में डॉक्टरों के लिए 7,249 स्वीकृत पद हैं, लेकिन 3,146 नियमित डॉक्टर ही कार्यरत हैं। यानी 57 फ़ीसदी पद खाली। संविदा डॉक्टरों की बात करें तो 2,314 स्वीकृत पदों में 533 ही भरे हुए थे। माने कि 77 फ़ीसदी पद खाली। क्या होगा बिहार का?
वहीं ग्रेड-ए नर्स की स्वीकृत 4,704 पदों में सिर्फ़ 2,096 ही कार्यरत हैं। और एएनएम (सहायक नर्सों) की स्वीकृत 21,859 पदों में 12,134 ही भरे हुए हैं। आशा कार्यकर्ताओं की संख्या अनुपातिक रूप से सही है। 93,687 स्वीकृत पदों में 93 फ़ीसदी यानी 85,708 कार्यरत हैं लेकिन आए दिन अपनी न्यूनतम वेतन की मांगों को लेकर सरकार से गुहार करती रहती हैं।
हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, बिहार स्वास्थ्य सेवा संगठन के महासचिव डॉक्टर रंजीत कुमार ने पिछले महीने बताया था कि राज्य में 70 फ़ीसदी तक डॉक्टरों की कमी है। स्वास्थ्य विभाग (ज़िला अस्पताल से लेकर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र/उपकेंद्र) में 11,393 स्वीकृत पदों में मात्र 2,700 नियमित डॉक्टर हैं। उनके अनुसार, मेडिकल कॉलेजों में असिस्टेंट प्रोफेसर और प्रोफ़ेसरों की 65% तक कमी है।
हालत ये हो गई है कि सरकार बिना किसी लिखित टेस्ट या इंटरव्यू के 3,100 डॉक्टरों की भर्ती करने वाली है। इस पर बिहार के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे ने ये तर्क दिया था कि एमबीबीएस की पढ़ाई के दौरान छात्रों को कम से कम 9 परीक्षाएं देनी ही पड़ती हैं।
रंजीत कुमार ने बताया कि WHO कहता है कि हर 1000 लोगों पर एक डॉक्टर होना चाहिए। 1983 में केंद्र सरकार द्वारा तैयार पहली स्वास्थ्य नीति में कहा गया कि हरेक 3,500 की आबादी पर एक डॉक्टर होना चाहिए। लेकिन बिहार में हर 50,000 की आबादी पर एक डॉक्टर है।
अभी राज्य में 37 ज़िला अस्पताल, 70 रेफरल अस्पताल, 55 अनुमंडल अस्पताल, 533 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, 9,949 उप-केंद्र और 1,379 अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र मौजूद हैं। सरकार ने 533 में से 399 स्वास्थ्य केंद्रों को अपग्रेड कर 30 बेड वाले सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में बदलने की योजना बनाई है।
इन केंद्रों और ज़िला अस्पतालों की ऐसी दुर्गति की गई है कि लोग भरोसा तक नहीं करते हैं और हर कोई प्राइवेट डॉक्टरों के यहां हज़ारों/लाखों ख़र्च करने पर मजबूर हैं और संतुष्ट भी हैं। मैं बेगूसराय जाने पर सदर अस्पताल जाता ही हूं और वहां की स्थितियों का एक प्रत्यक्ष गवाह हूं। लोगों को आधी से ज़्यादा दवाईयों के लिए बाज़ार में भेजा जाता है। जांच की सुविधा निजी अस्पतालों में कराने की नेक सुविधा कर्मचारियों द्वारा दी जाती है। कई जगहों पर मेडिकल की एक्स-रे, अल्ट्रासाउंड, सिटी स्कैन, एमआरआई जैसी बेसिक तकनीकी सुविधाएं नहीं हैं।
जितना मैंने लिखा है ये ऊपरी बातें हैं, इनकी तह तक जाने में आप भी बीमार हो सकते हैं। सरकार बजट के दौरान शेर-ओ-शायरी के ज़रिये एक सीधा-सपाट लब्बोलुआब देकर आपको मूर्ख बनाती है और फिर आप अख़बार व टेलीविज़न की हेडलाइन में खो जाते हैं।

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