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जन्मदिन विशेष: इरोम की अंतहीन लड़ाई!


आज इरोम शर्मिला चानू का जन्मदिन है। इरोम की ज़िंदगी से क्या हमें कुछ मिल सकता है? क्या इरोम हार की निशानी है? क्या इरोम को एक विजेता के तौर पर देखा जाय? इरोम हमें इस दुनिया की निष्ठुर ताकतों के ख़िलाफ़ लड़ने का रास्ता बताती है लेकिन इसी इरोम को देखकर लगता है कि एक अच्छा-खासा लंबा संघर्ष किस तरह आसानी से दफ़्न हो सकता है। क्या ऐसी हार को भी लोकतंत्र की ख़ूबसूरती माना जाय?

मार्च 2017 में मणिपुर के साथ उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब और गोवा का भी चुनाव परिणाम आया था। एक तरफ़ यूपी में भगवा ताकत अपनी जीत का जश्न मनाकर एक दंगाई को सीएम बनाने की योजना बना रही थी, दूसरी तरफ़ मणिपुर में सरकारी अत्याचार (अफस्पा) के ख़िलाफ़ 16 सालों तक लगातार बिना खाए अकेले अनशन करने वाली इरोम शर्मिला को वहां की जनता धोखा दे चुकी थी। 'आयरन लेडी' महज़ 90 वोट पाकर इस लोकतंत्र में ठगी जा चुकी थी।

दुर्भाग्य ये है कि अफस्पा मणिपुर में अब भी लागू है। सिर्फ़ मणिपुर में मानवाधिकार उल्लंघन के हज़ारों मामले हैं। जुलाई 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि मणिपुर के 1500 से अधिक मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों में जांच का प्रत्यक्ष आधार बनता है।

इरोम ने चुनाव में हार के बाद कहा था कि मैं ठगा हुआ महसूस कर रही हूं। सरकारी हिंसा के ख़िलाफ़ लड़ाई में इरोम का त्याग और उसकी चुनावी हार से वो हारी या नहीं, ये पता नहीं लेकिन मणिपुर ज़रूर हारा! हालांकि इरोम अब भी मानवाधिकारों के लिए अपनी लड़ाई जारी रखना चाहती हैं।

मानवाधिकार की लड़ाई लड़ने वालों के साथ क्या-क्या किया जा सकता है, इसके इतिहास में अनेकों उदाहरण हैं। पढ़ते-पढ़़ते नसें तन जाती हैं। बहुत हद तक संभव है कि आने वाले समय में वही सरकार जो मालोम में 10 लोगों की हत्या के लिए ज़िम्मेदार रही, वो इरोम के नाम पर सड़कों और भवनों के नाम रख दे।

इरोम के सालों के संघर्ष को कैसे महसूस करें? इरोम, मैं उत्तर में बैठकर तुम्हारे पूरब की ख़ुशबू ले रहा हूं, मैं तुम्हारे संघर्षों को ओढ़ने की कोशिश कर रहा हूं। तुम्हारी लड़ाई की एक-एक कड़ी देश के हर दिशाओं में बिखरी थी, जो जारी रहेगी।

इरोम शर्मिला की ये कविता पढ़िए, जो उन्होंने अपने कठिन संघर्षों के दौरान लिखी थी। कविता का हिंदी अनुवाद सत्याग्रह (स्क्रोल) वेबसाइट पर मिला।

जब जीवन अपने अंत पर पहुंच जाएगा
तब तुम मेरे इस बेजान शरीर को
ले जाना और कोबरू बाबा की मिट्टी पर रख देना
मेरे शरीर को आग की लपटों के बीच
अंगारों में तब्दील करने के लिए
कुल्हाड़ी और फावड़े से उसके टुकड़े-टुकड़े करना
मेरे मन को वितृष्णा से भर देता है
ऊपरी खोल को एक दिन खत्म हो जाना ही है
इसे जमीन के नीचे सड़ने देना
आने वाली नस्लों के काम का बनने देना
इसे बदल जाने देना किसी खदान के अयस्क में
मैं शान्ति की सम्मोहक खुशबू फैलाऊंगी
कांगलेई से, जहां मैं पैदा हुई थी
जो गुजरते वक्त के साथ
सारी दुनिया में फ़ैल जाएगी.

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