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कोरोना: आपदा से ज़्यादा व्यवस्था की मार झेलता मज़दूर वर्ग



मज़दूरों के पलायन की तस्वीरों को देखकर आपको क्या लग रहा है? आगे आपको पढ़ाया जा सकता है कोरोनावायरस के कारण लॉकडाउन हुआ, जिससे मज़दूर वापस जाने लगे। पलायन कोरोनावायरस की वजह से नहीं हो रहा है, बल्कि इस पूंजीवादी व्यवस्था से हो रहा है। अगर कोरोना से पलायन होता, तो हम और आप क्यों नहीं पलायन कर रहे हैं? कुछ इसे देखकर 1947 के विभाजन से तुलना कर रहे हैं। वो एक अलग दर्द था, जो समय रहते धीरे-धीरे भरा या भर ही रहा है। तुलना करने की बजाय कोर मुद्दे को पकड़ने का वक़्त है। वो एक मुल्क का विभाजन था और ये सामाजिक विभाजन है जिसका ये भयावह रूप है। और ये वे लोग हैं, जिसके ऊपर हमेशा मार पड़ती है।

ये समाज में मौजूद वर्ग संघर्ष की जीती जागती तस्वीर है। तस्वीरों को देखते हुए मुझे राजनीतिक अर्थशास्त्र समझ आने लगता है। अभी मैं पूंजीवादी व्यवस्था की खामियां गिनाने लगूंगा तो आप कहेंगे कि ये राजनीति का वक़्त नहीं है। लेकिन ये दर्द तो राजनीति की है। थोड़ा सोचिए, ये कैसी व्यवस्था है कि एक महीना काम नहीं मिलने पर लोग भूखे मरने लगेंगे, उनके पास कोई सोशल सिक्योरिटी नहीं है, वो शहर छोड़ने को सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलने के लिए तैयार हैं। आप इनके साथ सहानुभूति रखते हैं, अच्छी बात है। लेकिन क्या ऐसी व्यवस्था को उखाड़ कर फेंक नहीं देनी चाहिए?

सरकार ने सिर्फ़ उतना ही किया है जिससे आप उनकी पीठ थपथपा दें। मनरेगा मज़दूरों की पगार 182 से बढ़ाकर 202 रुपये कर दी गई। क्या अभी इस लॉकडाउन में कहीं काम चल रहा है? तीन महीने आपकी और हमारी सैलरी न मिले और बोला जाय कि आपको चावल-दाल दिया जाता है। तो क्या आप 3 महीने सिर्फ़ इस चावल-दाल को लेकर सर्वाइव कर लेंगे। क्या सरकार को तुरंत उन मज़दूरों के खाते में 10-15 हज़ार रुपये ट्रांसफर नहीं करनी चाहिए? ये असंभव नहीं है। उनकी पगार 20-25000 या उससे ऊपर क्यों नहीं है? क्या वे हमसे कम मेहनत करते हैं? नहीं ना। तो फिर ये भेदभाव क्यों? आप क्यों इस बराबरी की बात से डरने लगते हैं?

ठोस काम करने और ज़्यादा से ज़्यादा टेस्टिंग करवाने के बदले सरकार इवेंट मनाने में लगी हुई है। कभी थाली बजाओ तो दीया जलाओ। निकम्मी सरकार जब कुछ नहीं कर पाती है, तो ऐसे ही बेवकूफी भरे काम जनता से करवाती है। पूरे देश से इस तरह पागलपन करवा लेना मोदी के इवेंट मैनेजमेंट की ताकत को दिखाता है। यह राष्ट्रवादी सरकार और राष्ट्रवाद के ज़हर फैलने की भी उत्तम पहचान है। Covid-19 का इलाज देर-सवेर आ ही जाएगा, लेकिन इसका नहीं।

कोरोनावायरस से हम लोगों को कैसे बचाएंगे या इसको लेकर हम कितने तैयार हैं, ये सवाल सरकार से अब भी कोई नहीं पूछेगा, क्योंकि उसे पीटने के लिए इस बार थाली मिला है। लाठी, गाय, जाति, धर्म वगैरह के बाद एक नया नशा। थाली पीटना राष्ट्रवाद का व्यसन मालूम होता है, कोई सोचने को तैयार नहीं है।

3 साल पहले यही निकम्मी सरकार जब कुछ नहीं कर पा रही थी, तो नोटबंदी कर लोगों को लाइन में खड़ा कर दिया। आप उस वक्त भी लाइन में लगकर जश्न ही मना रहे थे। उसका क्या हुआ, कोई नहीं पूछना चाहता है।

अच्छा हुआ, कोरोनावायरस पाकिस्तान से नहीं फैला है, अगर ऐसा होता तो अब तक आप लोग बॉर्डर पर होते। सॉरी स्टूडियो के बॉर्डर पर। ख़ैर, इसके बावजूद चैनल ने आपके मनोरंजन के लिए पाकिस्तान को कम नहीं लपेटा है....

मेनस्ट्रीम मीडिया अब भी सरकार की पीठ थपथपाने में लगी है। वो अब भी क्रिटिकल होकर सरकार से टेस्टिंग बढ़ाने की मांग या डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ़ की ज़रूरतों पर सरकार से सवाल नहीं कर रही है।

सवाल यह है आख़िर क्यों हर आपदा की मार ये वर्ग ही सबसे ज़्यादा सहे? आज ये महामारी फैली है, कल बाढ़ आएगी, सुखाड़ आएगा, फिर ठंड से मौत होगी, आप और हम सहानुभूति दिखाएंगे। तस्वीरों को शेयर कर गुस्सा ज़ाहिर कर देंगे। लेकिन इस बीमारी की जड़ को ख़त्म करने की बात से आप डरने क्यों लगते हैं? क्या इसका जड़ आपको अब भी वर्ग विभाजन के रूप में खुलकर नहीं दिख रहा है? जिस समाज के लिए ये करोड़ों मज़दूर और किसान मेहनत कर रहे हैं वो समाज इनको क्या देता आया है? जवाब है- भूख, मौत और बीमारी।
(नोट: ये बातें मैंने मार्च के आखिर में लिखी थी। लेकिन ब्लॉग पर आज पब्लिश किया जा रहा है।)

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