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मिड डे मील वर्कर्स की सैलरी क्या राष्ट्रीय शर्म की बात नहीं है?

                                      (फोटो: CPM)

"नींद आएगी भला कैसे उसे शाम के बाद

रोटियाँ भी न मयस्सर हों जिसे काम के बाद"

क्या आपको पता है कि सरकारी स्कूलों में मिड डे मील (मध्याह्न भोजन) बनाने वाले वर्कर्स को कितनी सैलरी मिलती है? बिहार में सिर्फ़ 1,500 रुपये प्रति महीने, उसमें भी 10 महीने का ही भुगतान होता है। दक्षिण के राज्यों को छोड़ दें तो लगभग सभी राज्यों में इससे कुछ कम या ज़्यादा, लेकिन इतनी ही सैलरी है। तमिलनाडु में 6,000 और आंध्र प्रदेश में 3,000 रुपये। केरल में सबसे ज़्यादा प्रतिदिन और बच्चों की संख्या के हिसाब से 400-500 रुपये दिए जाते हैं।

देश भर में क़रीब 30 लाख वर्कर मिड डे मील के काम में लगे हैं। अनुमान है कि इसमें 90 फ़ीसदी से अधिक महिलाएं ही हैं। बिहार में इन्हें रसोइया बुलाते हैं। राज्य में इनकी संख्या क़रीब 2.5 लाख है। पिछले साल जनवरी-फ़रवरी में क़रीब 40 दिनों के हड़ताल के बाद राज्य सरकार ने 250 रुपये बढ़ाकर 1,500 किया था। क्या ग़ज़ब का एहसान किया नीतीश कुमार ने!

इसके अलावा इनके पास ना कोई सामाजिक सुरक्षा है और ना ही कोई अलग भत्ता। मुझे जहां तक पता है, जितने त्योहार की छुट्टियां होती हैं, उनमें इनका वेतन काट लिया जाता है। ये लोग लंबे समय से ख़ुद को सरकारी कर्मचारी घोषित करने और मानदेय बढ़ाने की मांग को लेकर राज्य सरकार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करते रहे हैं। लेकिन सरकार इनकी मांगों को रत्ती भर वैल्यू नहीं देती। अपने आपको 'मेनस्ट्रीम मीडिया' बताने वाले न्यूज़ चैनलों पर कितनी बार इन वर्कर्स के मुद्दों पर बात होते देखा है?

बिहार में क्वांरटीन सेंटर्स में भी कुछ रसोइये खाना बनाने के काम में लगे थे। जहां वो सुबह से शाम तक काम कर रहे थे। अभी तक उन्हें इसका भी वेतन नहीं मिला है। इस दौरान दो रसोइयों की मौत भी हो गई, लेकिन सब जानकारी होने के बाद भी सरकार चुप्पी साधे रही। ना कोई मुआवजा और ना कोई आश्वासन।

क्या 1,500 रुपये कमाकर आप अपना महीना चला सकते हैं? 5 ट्रिलियन डॉलर की इकॉनमी शायद महिलाओं के सस्ते श्रम और उनके पेट को कुचलकर बनाने का इरादा है! सालों से ये महिलाएं इसी तरह काम कर रही हैं। 1995 में ये योजना (राष्ट्रीय प्राथमिक शिक्षा पोषण सहायता कार्यक्रम) प्राइमरी स्कूल के बच्चों के लिए शुरू हुई थी। 1997-98 में पूरे देश में लागू हुई। 2001 में पका हुआ भोजन मिड डे मील के रूप में शुरू हुआ। फिर 2007 में इसे मिडिल स्कूलों तक भी पहुंचाया गया। कई बार अच्छे संशोधन भी हुए, लेकिन सरकार इसमें लगे कामगारों का हक मारती रही। इनके सालों का हिसाब कब होगा, पता नहीं।

ऐसा नहीं है कि ये कुछ घंटों का काम करती हैं और दिन में कोई दूसरे काम में भी लग जाएं। स्कूल में खाना बनाने, खिलाने और बर्तन धोने तक पूरे काम में 6-7 घंटे का समय लगता ही है। इसके बावजूद इतने सालों से इनकी सैलरी ऐसी ही रही। बिहार के संदर्भ में देखा जाय तो इसमें केंद्र सरकार 1000 रुपये देती है, बाकी राज्य सरकार भुगतान करती है। क्या ये राष्ट्रीय शर्म की बात नहीं है, जैसा कि एक बार सीपीआई नेता डी राजा ने कहा था।

केंद्र सरकार ने सालों से इनके मानदेय में संशोधन ही नहीं किया है। लेकिन राज्य सरकारों को भी शर्म आनी चाहिए। न्यूनतम मज़दूरी जैसी भी कोई चीज़ होती है, जो सरकारें ख़ुद तय करती है। हालांकि हमारे देश में इसका भी कोई सही मानक नहीं है। बिहार सरकार ने अलग-अलग श्रेणी में 'अकुशल' लोगों के लिए जो न्यूनतम मज़दूरी तय की है वो 250-280 रुपये प्रतिदिन है। अगर इस हिसाब से भी देखा जाय तो मिड डे मील वर्कर्स की सैलरी 8,000 रुपये से ज़्यादा होनी चाहिए थी।

                              (फोटो: सरोज चौबे)

राज्य में रसोइया संघ काफ़ी समय से 21,000 रुपये वेतनमान की मांग कर रहा है। इस वेतन के साथ उन्हें तमाम भत्ते और सुविधाएं भी मिलनी चाहिए जो सरकारी कर्मचारियों को दी जाती है। यही हाल देश भर में आशा वर्कर्स का भी है। समझ नहीं आता है कि जो लोग ग्राउंड पर दिन-रात बुनियादी कामों में लगे हैं, उनके साथ ये राष्ट्रीय अन्याय और भेदभाव क्यों है। कहीं इसके पीछे सरकार की पितृसत्तात्मक सोच तो नहीं है?

थोड़ा और डिटेल में आपको ले जाता हूं। बिहार में मिड डे मील भी सभी बच्चों तक नहीं पहुंच रहा है। सरकार का ही डेटा है कि 2018-19 में प्राइमरी स्कूल के सिर्फ़ 61 फ़ीसदी छात्रों तक इसका लाभ पहुंच रहा है। वहीं मिडिल स्कूल के 56 फ़ीसदी छात्रों को ही मध्याह्न भोजन मिल रहा है। सीमांचल ज़िलों (कटिहार, पूर्णिया, अररिया) में ये संख्या 50 फ़ीसदी से भी नीचे है।

मिड डे मील का उद्देश्य था कि शिक्षा का सार्वजनीकरण हो यानी शिक्षा हर किसी तक पहुंचे। इस लक्ष्य तक तो हम पहुंच गए या शायद अब भी कोशिश जारी है। लेकिन इस लक्ष्य को साकार बनाने वाले इन फ़्रंटलाइन वर्कर्स के श्रम का हिसाब कौन देगा? क्या ये दिनदहाड़े सरकारी डकैती नहीं है? क्या इनके श्रम का हिसाब चुनाव का मुद्दा बना है? वामदलों को छोड़कर कौन सी पार्टी इनके वेतन के मुद्दे पर प्रदर्शन करती है?

सबसे ऊपर दो लाइन जो लिखा है, उसका क्रेडिट देने में सक्षम नहीं हूं। बस चाहता हूं कि आप इन मुद्दों पर सोचना शुरू करें। मात्र 1500 रुपये।

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