"कहाँ उलझे हुए हो इन सब चीजों में, कुछ अच्छी नौकरी करो! पूरा मीडिया तो बिका हुआ है। बिहार के लोग तो बहुत तेज होते हैं। मैंने देखा है कि शारीरिक और मानसिक दोनों तरीके से आप लोग काफ़ी मज़बूत होते हैं। आइएएस भी तो आप ही के यहाँ से बहुत बनते हैं।"
यह वाक्या एक बड़े अधिकारी ने मुझसे कहा, क्योंकि मैं मीडिया की पढ़ाई कर रहा हूँ। वैसे इस तरह की चीजें कहीं न कहीं से मेरे पास आती रहती हैं। घूमते- फ़िरते कहीं पर भी रूक कर सवाल करना आदत बनती जा रही है। एक दिन पहले, अचानक से भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अंतर्गत काम कर रहे 'केन्द्रीय समाज कल्याण बोर्ड' के दफ्तर पहुँच गया। यह एक स्वायत्त संस्था है, जो कि महिलाओं और बच्चों के लिए कई सारे योजनाओं पर काम करती है। वहाँ एक बड़े अधिकारी से मिला, लगा जैसे कि शायद बात करने के लिए बहुत देर से मेरा इंतज़ार कर रहे हों। बहुत सारी जानकारी भी मिली, लेकिन वो मेरे बारे में जानने के लिए ज़्यादा उत्सुक होने लगे। उन्हें बताया कि मीडिया में आना बचपन का शौक था। इसलिए अब मैं आज का ('सबसे अच्छा' और 'सबसे बुरा') फ़ील्ड के लिए ख़ुद को तैयार कर रहा हूँ। सरकारी नौकरी करने का कभी शौक नहीं रहा है। समाज की परिस्थितियों को क़रीब से देखने के कारण, अब ज़िम्मेदारी भी बढ़ती चली जा रही है। कुछ तो है, जो इस जोश को बनाए हुए है।
उनको बिहार के बारे में जानने की दिलचस्पी थी। बिहार में घुसने के बाद समस्याओं का स्पाइरल बनता चला गया। उन्होंने पानी के लिए भी पूछा, लेकिन बातचीत रमती हुई नज़र आ रही थी, इसलिए मना कर दिया। अच्छा हुआ जाति को लेकर उन्होंने ज़्यादा कुछ नहीं पूछा, नहीं तो पूरी बातचीत उसी में निकल जाती। उन्होंने समस्याओं के समाधान के बारे मुझसे पूछा, तो बता दिया कि शिक्षा व्यवस्था को मज़बूत बनाना ही सबसे बड़ा हल है। इसके अलावा लोगों को धर्म और जाति के चश्मे को हटाकर दुनिया देखने की ज़रूरत है, तभी राजनीति भी सुधर जाए। क़ानून व्यवस्था में सुधार के साथ मैंने मीडिया की सक्रियता पर भी ज़ोर दे दिया, क्योंकि बिहार के पत्रकारिता का इतिहास भी बहुत पुराना है। आजकल मीडिया की भागीदारी का गुणगान हर जगह करने की आदत हो गई है। ये समाधान काफ़ी हैं या कम, ये मुझे नहीं पता। चुँकि पढ़ाई- लिखाई के माहौल के बारे में ही ज़्यादा बात हुई, इसलिए बिहार से लेकर दिल्ली तक पूरी बातचीत के बाद उन्होंने ऊपर वाला वाक्या बोल दिया।
उनके इस कथन पर हँस दिया और कहा कि अपनी- अपनी समझ है। वैसे मीडिया के बारे में लोगों की समझ काफ़ी अच्छी हो गई है। बिहार के लोगों की तारीफ़ सुनकर अच्छा लगा, लेकिन सच्चाई थोड़ी अलग है। सरकारी नौकरी करने के अलावा छात्रों और अभिभावकों को कुछ रास्ता दिखता नहीं है। यह बिहार के पूरे तंत्र के लिए बड़ी चुनौती है। लोगों के वैकल्पिक सोच का दायरा कब तक बढ़ेगा, यह तो पता नहीं लेकिन सरकारी नौकरी का अपना मज़ा है।
अभी कुछ ही महीने हुए हैं दिल्ली आए हुए और उम्मीदें, मेरे से ज़्यादा दूसरों की बढ़ी हुई रहती हैं। अंत में उन्होंने करियर के लिए 'बेस्ट ऑफ़ लक' भी विश कर दिया।
यह वाक्या एक बड़े अधिकारी ने मुझसे कहा, क्योंकि मैं मीडिया की पढ़ाई कर रहा हूँ। वैसे इस तरह की चीजें कहीं न कहीं से मेरे पास आती रहती हैं। घूमते- फ़िरते कहीं पर भी रूक कर सवाल करना आदत बनती जा रही है। एक दिन पहले, अचानक से भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अंतर्गत काम कर रहे 'केन्द्रीय समाज कल्याण बोर्ड' के दफ्तर पहुँच गया। यह एक स्वायत्त संस्था है, जो कि महिलाओं और बच्चों के लिए कई सारे योजनाओं पर काम करती है। वहाँ एक बड़े अधिकारी से मिला, लगा जैसे कि शायद बात करने के लिए बहुत देर से मेरा इंतज़ार कर रहे हों। बहुत सारी जानकारी भी मिली, लेकिन वो मेरे बारे में जानने के लिए ज़्यादा उत्सुक होने लगे। उन्हें बताया कि मीडिया में आना बचपन का शौक था। इसलिए अब मैं आज का ('सबसे अच्छा' और 'सबसे बुरा') फ़ील्ड के लिए ख़ुद को तैयार कर रहा हूँ। सरकारी नौकरी करने का कभी शौक नहीं रहा है। समाज की परिस्थितियों को क़रीब से देखने के कारण, अब ज़िम्मेदारी भी बढ़ती चली जा रही है। कुछ तो है, जो इस जोश को बनाए हुए है।
उनको बिहार के बारे में जानने की दिलचस्पी थी। बिहार में घुसने के बाद समस्याओं का स्पाइरल बनता चला गया। उन्होंने पानी के लिए भी पूछा, लेकिन बातचीत रमती हुई नज़र आ रही थी, इसलिए मना कर दिया। अच्छा हुआ जाति को लेकर उन्होंने ज़्यादा कुछ नहीं पूछा, नहीं तो पूरी बातचीत उसी में निकल जाती। उन्होंने समस्याओं के समाधान के बारे मुझसे पूछा, तो बता दिया कि शिक्षा व्यवस्था को मज़बूत बनाना ही सबसे बड़ा हल है। इसके अलावा लोगों को धर्म और जाति के चश्मे को हटाकर दुनिया देखने की ज़रूरत है, तभी राजनीति भी सुधर जाए। क़ानून व्यवस्था में सुधार के साथ मैंने मीडिया की सक्रियता पर भी ज़ोर दे दिया, क्योंकि बिहार के पत्रकारिता का इतिहास भी बहुत पुराना है। आजकल मीडिया की भागीदारी का गुणगान हर जगह करने की आदत हो गई है। ये समाधान काफ़ी हैं या कम, ये मुझे नहीं पता। चुँकि पढ़ाई- लिखाई के माहौल के बारे में ही ज़्यादा बात हुई, इसलिए बिहार से लेकर दिल्ली तक पूरी बातचीत के बाद उन्होंने ऊपर वाला वाक्या बोल दिया।
उनके इस कथन पर हँस दिया और कहा कि अपनी- अपनी समझ है। वैसे मीडिया के बारे में लोगों की समझ काफ़ी अच्छी हो गई है। बिहार के लोगों की तारीफ़ सुनकर अच्छा लगा, लेकिन सच्चाई थोड़ी अलग है। सरकारी नौकरी करने के अलावा छात्रों और अभिभावकों को कुछ रास्ता दिखता नहीं है। यह बिहार के पूरे तंत्र के लिए बड़ी चुनौती है। लोगों के वैकल्पिक सोच का दायरा कब तक बढ़ेगा, यह तो पता नहीं लेकिन सरकारी नौकरी का अपना मज़ा है।
अभी कुछ ही महीने हुए हैं दिल्ली आए हुए और उम्मीदें, मेरे से ज़्यादा दूसरों की बढ़ी हुई रहती हैं। अंत में उन्होंने करियर के लिए 'बेस्ट ऑफ़ लक' भी विश कर दिया।
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