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बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को मेरा खुला पत्र।

माननीय मुख्यमंत्री,
                     मैं साकेत आनंद, बेगूसराय, बिहार का रहने वाला हूँ। अभी मैं भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली से पत्रकारिता की पढ़ाई कर निकला हूँ। मैं आपको बिहार के शिक्षा व्यवस्था के बारे में अवगत कराना चाहता हूँ। हर साल बोर्ड परीक्षा के परिणाम आने के बाद बिहार के शिक्षा व्यवस्था की देश भर में आलोचना होती है। और पिछले दो सालों में शिक्षा माफिया और अंदरूनी व्यवस्था से आप भी काफ़ी अवगत हो चुके हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि ऐसे हालत देश के और भी कई राज्यों में हैं। लेकिन बिहार की स्थिति के बारे में आप और हम सभी जानते हैं। पिछले साल भी मैट्रिक की परीक्षा में कुल 15 लाख छात्रों में साढे आठ लाख छात्र फ़ेल हो गए थे। और इंटरमीडिएट के रिज़ल्ट और टॉपर घोटाले की बात भी किसी से छिपी नहीं थी। इस बार भी इंटरमीडिएट के रिज़ल्ट आपने और हम सभी ने देखें। इन सब खुलासों के बाद मीडिया उसे अपने एंटरटेनमेंट की स्टोरी के रूप में परोसने को तैयार बैठा रहता है। इसके बावजूद आप अधिकारियों के ट्रांसफर के अलावे शिक्षा के मूलभूत सुधार के लिए कभी कड़ा कदम नहीं उठा पाए। अभी भी सरकारी स्कूलों के बच्चे अच्छी शिक्षा और अच्छे शिक्षकों के मोहताज है।

सर, आपने अपने पहले कार्यकाल में बिहार के विकास के लिए जमकर काम किया। सड़क निर्माण से लेकर भ्रष्टाचार दूर करने तक आपने काफ़ी गंभीरता से ज़िम्मेदारी उठाई। पिछले 12 साल से लगातार (कुछ महीनों को छोड़कर) आप बिहार के मुख्यमंत्री पद पर बैठे हैं। लोगों में आपको लेकर बहुत आस जगी थी, जिसे आपने पूरा भी किया। लेकिन शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था पर तमाम कोशिश के बावजूद, आप हालात नहीं सुधार पाए। चुंकि मैंने ख़ुद दसवीं तक सरकारी स्कूल में पढ़ाई की है, इसलिए उसकी हालत को अच्छी तरह समझता हूँ। आज के दौर में किसी भी समाज की मूलभूत आवश्यकता बेहतरीन शिक्षा और स्वास्थ्य ही है। लेकिन बिहार के सरकारी स्कूलों की हालत जस की तस है। शिक्षकों की नियुक्ति की प्रक्रिया से लेकर हर सरकारी भर्ती तक में बिहार में भ्रष्टाचार है, इसे मानने में हम और आप पीछे नहीं हट सकते। आपने इस साल भी शिक्षा के बजट को 11 फ़ीसदी बढ़ाकर 25,251 करोड़ (पूरे बजट का लगभग 15 फ़ीसदी) कर दिया। केन्द्र सरकार के शिक्षा बजट (कुल बजट का 3.7 फ़ीसदी) और दूसरे राज्यों के मुक़ाबले यह बेहतर तो है ही। यह ख़ुशी की बात है कि बजट का एक बड़ा हिस्सा शिक्षा के क्षेत्र में दिया जा रहा है, लेकिन हालात सुधर क्यों नहीं रहे हैं। इसका सीधा कारण है कि आपकी मशीनरी में जो लोग बैठे हैं, वे ईमानदार नहीं हैं। इसके लिए आपको सख़्त कदम उठाने ही होंगे। हर साल सरकारी नौकरी दिलाने के नाम पर पटना में बैठे शिक्षा माफिया करोड़ों का कारोबार कर रहे हैं। पिछले साल की घटना सबक लेने के लिए काफ़ी था। अगर आप सच में इस मुद्दे पर गंभीर हैं, तो आपको स्पीडी ट्रायल कर जांच करवानी चाहिए। ख़ैर, ये सिर्फ़ एक पहलू है, मैं आपको शिक्षा के सारे आयामों को लेकर सुधार करने की बात कर रहा हूँ।

दिल्ली सरकार ने अपने बजट का 24 फ़ीसदी हिस्सा शिक्षा पर ख़र्च किया है, लेकिन साथ ही पूरे तंत्र को मज़बूत बनाने के लिए वे ज़मीनी हालात को सुधारने की ज़्यादा कोशिश कर रहे हैं। मैंने बेगूसराय, समस्तीपुर के ही जिन सरकारी स्कूलों के हालात देखे हैं, वह बहुत ही दयनीय स्थिति में हैं। अच्छे शिक्षकों की कमी, क्लासरूम की कमी, मैनेजमेंट की कमी, बुनियादी सुविधाओं का अभाव, शिक्षा के आधुनिकता से जुड़ाव का अभाव और भी कई सारी समस्याएं ज़मीनी स्तर पर हैं। जिसमें प्राथमिक विद्यालय, मध्य विद्यालय से लेकर इंटरमीडिएट कॉलेजों तक की यही स्थिति है। स्कूल और कॉलेजों में क्लासेस ही नहीं लगते, जिससे बच्चे भी ख़ुश रहते हैं। अच्छी आय वाले बच्चे प्राइवेट कोचिंग संस्थानों में पढ़कर पास कर लेते हैं, लेकिन ग़रीब बच्चे वहीं के वहीं रह जाते हैं। लोग सरकारी स्कूलों के बच्चों को अलग ही नज़रों से देखते हैं। सर, स्थिति तो भयावह है ही, अगर आज के दिन से इसमें ज़मीनी स्तर पर सुधार करने की कोशिश की जाय तो इसमें कम से कम दस साल लगेंगे। इसलिए सतर्कता के साथ इसमें ध्यान दें। ऐसा न हो, अगले दस साल में और राज्य जितने आगे बढ़ेंगे, हम बुनियादी पकड़ भी न बना पाएं।

और एक बात मैं स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर कहना चाहता हूँ। सरकारी अस्पतालों की हालत पहले से ही बेहतर नहीं हैं और मौजूदा बजट में आपने 16 फ़ीसदी तक स्वास्थ्य बजट को कम कर 7,001.52 करोड़ पर ला दिया। मैं पहले भी आपको ट्विटर के माध्यम से इसकी जानकारी देता आया था। वहां आधी दवाईयां उपलब्ध नहीं रहती, लोगों को बाज़ार से महंगी दवाओं को ख़रीदना पड़ रहा है। बहुत सारे अस्पतालों में तकनीकी सुविधाओं जैसे एक्स-रे, अल्ट्रासाउंड, सिटी स्कैन, एमआरआई की सुविधा तक नहीं है और आप बजट में कटौती कर जनता को क्या बताना चाहते हैं? क्या आप बिहार के नाम पर वही पुराना धब्बा देखना चाहते हैं?

सर, किसी भी सरकार की प्राथमिकता मुफ़्त शिक्षा और स्वास्थ्य तो होनी ही चाहिए, लेकिन इस बार जनहित के मुक़ाबले आप राजनीतिक गतिविधियों में मुखर नज़र आ रहे हैं। हालात बदतर हैं, इसलिए ज़मीन से जुड़ने की कोशिश करें और अपने पूरे सरकारी मशीनरी को जनता के लिए उपलब्ध कराएं। बिहार की जनता ने आपको हमेशा से प्यार दिया है, एक अच्छे नेता की क्वालिटी आपमें ढ़ूंढ़ी है। लेकिन, इन सबके बावजूद अगर ग़रीबों, मज़दूरों और वंचितों को शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मूलभूत चीज़ें सही तरीक़े से उपलब्ध नहीं करा पाते हैं, तो यह आपकी हार होगी। यह बिहार के लोगों की हार होगी और आपके जनमत की हार होगी।
उम्मीद है, मुझे आपकी तरफ़ से इस पत्र का जवाब मिलेगा।

Thank you
Saket Anand
Begusarai, Bihar

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